Sunday, October 5, 2008

सारे त्योहारों की ज़िम्मेदारी हमारे ही जिम्मे क्यों?

रमजान में अफ्तार करने के बाद आराम करने को दिल चाहता है. होता ये है कि दिन भर खाली पेट में जब गिजा (खाना) जाती है तो जिस्म में सनसनाहट पैदा होती है और थोडी गुनूदगी (नींद जैसी) कैफियत पैदा होजाती है. ज़ाहिर सी बात है, ऐसे में सब में ही आराम की ख्वाहिश जागती है लेकिन ज्यादातर होता ये है कि मर्द हजरात नमाज़ वगैरा से फारिग होकर मज़े से आराम करने लगते हैं और ओरतें अफ्तार के बाद खाने की फ़िक्र करने लगती हैं. खाना जल्दी तैयार होना चाहिए क्योंकि जल्दी सोना है, तभी सहरी में उठ सकेंगे.
सहरी में फिर खिलाने की फ़िक्र –चाहे हल्का फुल्का ही सही.
इतनी ड्यूटी निभाने के बाद भी अगर कोई ओरत पूरी तरह से इबादत कर लेती है तो वाकई उसके जैसा इबादत गुजार होने का कोई मर्द तसव्वर भी नही कर सकता.
ये तो रही रमजान की बातें.
आखिरी रोजे की अफ्तार से फारिग होते ही मेरी ममा आराम वगैरा भूल कर ईद की तैयारी की फ़िक्र में लग गयीं .
अब हालत ये है कि कभी बुआ (cook) को हिदायत दे रही हैं, कभी हम लोगों पर नाराज़ हो रही हैं कि हमें तो कल की कोई फ़िक्र ही नही. अब हम भला क्या करें, एक तो दिन भर का रोजा , ऊपर से काम इतने कि समझ में नही आरहा कि शुरू कहाँ से करना है?
दही बड़ों के लिए दाल भीग गई है, उसे पीसना है, छोले के लिए मसाला तैयार करना है, इमली की अखरोट और चिरौंजी वाली चटनी इसी वक्त तैयार होनी है, सेवइयां भून कर रखनी हैं. शामी कबाबों का मसाला तैयार करना है. यहाँ देहरादून में एक अलग तरह की सेवइयां बनती हैं जिसे' शीर खोरमा ' कहते हैं. ये खीर जैसी होती है, बस ऊपर से उस में थोडी भुनी सेवइयां डालनी होती हैं.
इधर दादी जान का आर्डर है कि मुगलई सेवइयां(खुश्क खोये वाली) तो ज़रूर बननी हैं. बाबा का ये एलान कि ‘ईद बिल्कुल सादगी से मनानी है’’ दूर कहीं कोने में रखा हैरानी से इस सादगी को देखे जारहा है.

पापा का कहना था कि मेहमान अगर खाना खाना चाहें तो उसका इंतजाम भी होना चाहिए. तो लीजिये जनाब, अब चिकन बिरयानी भी बनेगी . खैर पापा ने कहा कि बिरयानी तो सुबह उनका एक आदमी आकर तैयार करेगा. लेकिन मसाला वगैरा तो तैयार करना ही होगा. थोडी देर बाद पापा एक और इजाफा करने आ पहुंचे..’’ यार मेहमानों में जो लोग वेजेटेरियन होंगे उनके लिए थोड़े बर्गर वगैरा का इंतजाम कर लो. लीजिये यानी कि हद हो गई….वेज खाने वाले अगर बिरयानी या कबाब नही खाएँगे तो दही बड़े, छोले भठूरे और इतने टाइप की सेवइयां क्या कम हैं जो बर्गर और साथ में वगैरा भी बनायें, लेकिन पापा से बहेस कौन करे.
बहरहाल रात के बारह बजे तक बुआ ममा और हम बहनें तैयारी में लगे रहे. तब कहीं जाकर सोना नसीब हुआ.
इतनी थकन के बाद सुबह उठने का किसका दिल चाहेगा , लेकिन अभी तो सारे काम बाकी थे . उठना ही पड़ा.
अब ईद की सुबह का नज़ारा कुछ यूँ है कि हम तो जम्हाइयां ले रहे हैं, ममा और बुआ किचन में लगी हुयी हैं, दादी जान सफाई करने वाली अनीला और मंजू को नए नए आर्डर देरही हैं…साथ साथ हम दोनों की भी क्लास ले रही हैं. इधर पापा, बाबा जान और भाई नहा कर नए कपड़े पहनकर नमाज़ के लिए ईदगाह जाने की तैयारी कर रहे हैं.
थोडी देर में ही महकते निखारते सलाम दुआ से फारिग होकर गाड़ी में रवाना हो गए. अब हम रह गए और हमारे ढेर सारे काम.
12 बजे तक साड़ी तैयारी से फारिग हुए, खैर झूट क्यों बोलें , हमें तो मामा ने पहले ही तैयार होने को भेज दिया था लेकिन ममा और ख़ास कर बुआ को 12 बजे जाकर फुर्सत मिली.
फुर्सत?
फुर्सत कहाँ मिली, अब तो जैसे तैसे नहाकर तैयार होना था और उसके बाद महमानों को attend करने की अलग ड्यूटी निभाना थी.
बहरहाल होने को तो सब हो गया, निखरी निखरी ममा तैयार भी हो गयीं . पापा के साथ मुस्कुरा मुस्कुरा कर मेहमानों को attend भी करती रहीं. आने वाले मेहमान जम कर तारीफें भी करते रहे, ममा की ड्रेसिंग को सराहते भी रहे लेकिन रात होते होते ममा और बुआ की जो हालत हुयी उसे बयां नही किया जासकता . दोनों दर्द की दवाएं खाकर सो सकीं .
ख़ुद मेरा थकन से बुरा हाल था.दूसरे रोज़ सब की हालत कह्राब थी.पापा ने लंच बाहर से मँगवाया .
ये तो रहा हमारे घर का ज़िक्र , यहाँ तो खैर ममा की हेल्प के लिए माशाल्लाह कई लोग हैं लेकिन ऐसे भी घर हैं जहाँ तमाम कामों की ज़िम्मेदारी घर की ओरतों पर होती हैं, ज़यादा से ज़्यादा सफाई और बर्तन के लिए मुलाज़्मा (मासी ) आजाती है. ऐसे में उन लोगों की क्या हालत होती होगी, इसका तसव्वुर भी तकलीफ देह होता है. दुःख की बात तो ये है ki इस की शिकायत करना भी निकम्मे होने का सबूत मान लिया जाता है.सिर्फ़ ईद या रमजान ही नही, हमारे यहाँ जितने त्यौहार हैं, चाहे वो ईद-उज़ -जुहा हो, कूंडा हो या शब् -ऐ-बारात…सब के सब थका देने वाले, और मज़े की बात तो ये है कि ये थकान बस घर की ओरतों के खाते में लिखी जाती है. त्यौहार कोई भी हो, ज़िम्मेदारी बस ओरतों पर, उन्हें इंतजाम भी करने हैं और इंतजाम भी ऐसे कि आने वाले तारीफ़ किए बगैर ना रह सकें और मर्द हजरात मुस्कुरा मुस्कुरा कर इस तारीफ़ को अपना हक़ समझ कर बड़े फख्र से वसूल करते हैं. कहीं कोई गड़बड़ हो गई तो बेचारी ओरत दिल पर एक बोझ लिए मुजरिम बन जाती है, चाहे कोई कुछ कहे या न कहे.
क्योंकि बचपन से लड़कियों के दिमाग में ये बात डाल दी जाती है कि उन्हें अच्छा मुन्ताजिम कार होना चाहिए , यही एक कामयाब ओरत की पहचान है.
और मज़े की बात ये है कि ये कोई मर्द नही सिखाता ,ये सीख हमारी कौम की ओरतें ही देती हैं.
घर में इस मौज़ू (टोपिक ) पर बात करना चाहो तो टोकने वाली सब से पहली मेरी दादी जान होती हैं जो बड़े आराम से मुझे ‘निकम्मी लड़की’ का खिताब नवाज़ देती हैं. उनका कहना है कि ये सारे वावैले (विरोध ) आजकल की नालायक लड़कियां ही उठाती हैं, वरना त्यौहार तो खुशियाँ लेकर आते हैं, ज़रा सा हाथ पैर हिला लेने में शिकायत कैसी.
ममा इस टॉपिक पर ‘नो कमेन्ट ’ का तास्सर देते हुए मुस्कुराती रहती हैं.
मुझे इस बात से इत्तफाक है कि त्यौहार खुशियों का पैगाम होते हैं. वैसे भी पूरे साल एक रूटीन से उकताई हुयी जामिद जिंदगी में ताज़गी की नई फुआर ले आते हैं ये त्यौहार.
सवाल ये नही है कि इनकी तैयारियां और इंतजाम थका देने वाले होते जारहे हैं, सवाल ये है कि सारे त्योहारों की ज़िम्मेदारी अकेले ओरत पर ही क्यों?
पूरे साल में कोई एक त्यौहार, कोई एक मौका तो ऐसा होना चाहिए ना जब जिसका इन्तजाम और ज़िम्मेदारी मर्दों पर हो. जिम्मेदारियों से आजाद घूमने फिरने के मौके ओरत को भी दिए जाएँ . उन्हें भी अहसास हो कि त्यौहार वाकई खुशियाँ लाते हैं. बगैर किसी ज़िम्मेदारी का अहसास किए वो भी अपने लोगों से मिलजुल सके. खुल के हंस सके.

कभी कभी दादी जान का मूड जब खुश गावर होता है तो मैं ये बात उन से कहती हूँ . ये भी पूछती हूँ कि क्या आपको जिंदगी के किसी मौके पर ऐसा ख़याल छू कर नही गुज़रा ?
ऐसे मौकों पर दादी कोई नादीदा (अनदेखी ) चीज़ अपनी तकिये के नीचे तलाश करने लगती हैं, ऐसा लगता है जैसे कोई बहुत कीमती चीज़ तकिये के नीचे से गायब हो गई हो. लेकिन सच मैं जानती हूँ.
मैं जानती हूँ कि उन्हें किसी चीज़ की तलाश नही है, बल्कि वो मेरे सवाल से बचना चाहती हैं, क्योंकि इसका कोई जवाब उनके पास है ही नही.

29 comments:

फ़िरदौस ख़ान said...

तहरीर पढ़ने में नहीं आ रही है...

Nitish Raj said...

रक्षांदा जी, ये हर जगह की औरतों का हाल है। मैं खुद अपने घर में देखता हूं कि मेरी मम्मी कैसे लगी रहती थीं काम में और हम कुछ करना चाहते तो हम घर की महिलाएं ही ये टोक देती कि चूल्हा चौके का काम लड़कों को शोभा नहीं देता। बिल्कुल सही लिखा है। यदि शिकायत हुई तो निकम्मी और आलसी का तबका मम्मी पर मढ़ दिया जाता था। लेकिन बाद में हमें लगा कि ये ठीक नहीं है मां कब तक लगी रहेंगी तो हम हाथ बटाने लगे। और ये सिलसिला जो शुरू हुआ तो आज भी किसी भी पर्व पर अपनी बेगम का भी हाथ बटाते रहते हैं और फिर मिलकर जश्न मनाने की कोशिश करते हैं।

neeshoo said...

सब कुछ अकेले हां अच्छी बात नहीं है आपका लिखा पढा मुंह में पानी
आगया । चलिये अच्छा है हमने तो पढंकर महसूस किया आपने चखकर । बढ़िया है जी

Manish Kumar said...

Aapne itne lazeez vyanjanon ke jikra sath ek sanjeeda masle ko utha kar achcha nahin kiya :).

Khair aapki baat sahi hai. Hum log to bilkul nikhattu ban jate hain . Bas bahar se saman la ke de diya aur ho gaye nishchint.

Haan ye juroor hai ki gharwale khud hi jab tak tarah tarah ki cheezein bana na lein to unhein chain nahin aata.

Deepak Bhanre said...

सही कहा आपने . ऐसा लगभग काफ़ी घर मैं होता है .
किंतु उत्सवों और त्योहारों के अवसरों पर आज कल अधिकाँश घरों मैं मिलजुलकर हर तैयारियां पूरी की जानी लगी है . ऐसे अवसरों मैं मिलजुलकर खुशी मनाने का मजा ही कुछ और होता है .

नीरज गोस्वामी said...

आपकी बात सो फीसदी सही है, हर घर में त्योंहार पर सबसे ज्यादा मेहनत महिला को ही करनी पढ़ती है...ये कहा जाए की सारे त्योंहार घर की महिलाओं पर ही टिके हैं तो ग़लत नहीं होगा.
नीरज

सतीश सक्सेना said...

अगर तुम ऐसा ही लिखती रहीं तो बहुत जल्द पूरा देश तुम्हारे परिवार से जुड़ जायेगा , तुम्हारे लेखन में ऐसा अपनत्व व खुलापन है कि लगता है यह पकवान मेरे घर में हमारे लिए बन कर तैयार हुए हैं लडकी, और खाने को नही मिले :-)
" त्यौहार कोई भी हो, ज़िम्मेदारी बस ओरतों पर, उन्हें इंतजाम भी करने हैं और इंतजाम भी ऐसे कि आने वाले तारीफ़ किए बगैर ना रह सकें और मर्द हजरात मुस्कुरा मुस्कुरा कर इस तारीफ़ को अपना हक़ समझ कर बड़े फख्र से वसूल करते हैं. कहीं कोई गड़बड़ हो गई तो बेचारी ओरत दिल पर एक बोझ लिए मुजरिम बन जाती है, चाहे कोई कुछ कहे या न कहे"
क्योंकि बावा से मैं तो कुछ कह नहीं सकता सो यह बात मैं..... नारी और चोखेरवालियों को बता दूँगा :-)

एक और खूबसूरत ख़त लिखने के लिए बधाई रख्शंदा ...

Rakesh Kaushik said...

आपकी बात सो फीसदी सही है, हर घर में त्योंहार महिलाओं पर ही टिके हैं सबसे ज्यादा मेहनत महिला को ही करनी है...

RAkesh Kaushik

रूपाली मिश्रा said...

aapne to poore hindustan ki mahilaon ki dukhti rag chhed di
sachchi aise hi har ghar men hota hai eid ho ya navratri
ham juti rahti hain kaam men aur purush aaram aaram se tyohaar manate jate hain
are yaar kharidaari tak hami ko karna padta hai

mamta said...

इसमे कोई दोराय नही है कि अधिकाँश घरों मे ऐसा ही होता था और होता है । वैसे अब थोडी-थोडी धारणा बदल रही है ।
एक बात कि तारीफ करनी होगी कि आपकी पोस्ट मे उर्दू के लफ्ज पढने मे बहुत अच्छे लगते है ।

अरे रक्षंदा इतने सारे पकवान बनाए और खाए और यहाँ एक की भी फोटो तक नही लगाई । :)

SHUAIB said...

देर से सही, ईद मुबारक। आपने बातों बातों मे ऐसे पकवान गिनवादिए कि मूंह भर आया। आप भी कुछ मुझ जैसा लिखती हैं यानी हिन्दी-उर्दू की खिचड़ी :)

makrand said...

bahut sunder rachna
do visit if possible to my post
makrand-bhagwat.blogspot.com

dr. ashok priyaranjan said...

badi khoobsurati sey ek ek baat ko puri aatmiyata sey bayaan kiya hai.

http://www.ashokvichar.blogspot.com

निरन्तर - महेंद्र मिश्रा said...

badhiya sujhaav or achchi abhivyakti .

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

कुछ त्योहार ऐसे भी होने चाहिए जिन में मर्द पकाएँ औरतें मनाएँ। वैसे मेरे बचपन में मैं ने ऐसे त्योहार देखे हैं जिन में पिता जी और हम रसोई में होते थे और मां और दादी बाहर।

Udan Tashtari said...

पहले तो ईद के पकवानों से हमें ललचाने का आभार. सभी मेरी पसंद के आईटम बने. भारत में निश्चित ही घर की महिलाओं को इस तरह जूझते देखा था त्योहारों पर. घर में कितने ही नौकर क्यूँ न लगे हों, माँ तो लगी ही रहती थीं. यहाँ तो सब मिलजुल कर ही करना होता है.

राज भाटिय़ा said...

रक्षांदा जी,भाई घर की माल्किन भी तो ओरत ही है, किचन पर उस का पुरा कब्जा होता है, वेसे जब कभी हमारे यहां पार्टी बगेरा होती है तो मै अपनी बीबी का कहना एक गुलाम की तरह से मानता हुं ओर पुरी मदद करता हुं अजी मै क्या मेरे बेटे भी, फ़िर जब मेहमान आ जाते है तो सभी ओरते मिल कर काम करती है, आप मानो या ना मानो भारत की ओरतो को देख कर गोरिया भी काम करती है,एक बार हमारे घर पर ८०,९० लोगो की पार्टी थी ओर हमारा डिश्बासर खराब हो गया, तो सभी देशी ओर विदेसी महिलाओ ने बरतन भी साफ़ किये,
फ़िर बाद मे हमदो दिन तक आराम करते है, मै अपनी बीबी की मदद करता हुं लेकिन कम क्योकि उसे अच्छा नही लगता,मुझे खाना खाना आता है बनाना नही, २० सालो मे मेने एक बार चाय बनाई बहुत स्वाद लेकिन किसी ने भी नही पी, मेने भी नही पी, एक बार चावल बनाये सब ने खाये सभी बिमार हो गये, अब किचन मे उस तरफ़ जाना भी मेरा मना है जिस तरफ़ किचन का बर्क शाप यानि चुलहा वगेरा है,
ओर आप ने खम्खा मे कह दिया मर्द काम नही करते,मेरी तरह से सारे मर्द काम करने को तेयार है मगर आप लोग उन्के हाथ का खाये तो सही
वेसे हम ने ५/ १० को ईद मनाई ओर खुब खाना काया फ़िर मिठ्ठाई भी यह सब भी बनाया था रीमा जी ने ही था
धन्यवाद

लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` said...

रक्षँदा जी
आप देहरादून मेँ आबाद हैँ ? वाह ..आपके शहर की बातेँ भी लिखियेगा और ईद मुबारक !! ..
औरतेँ जब तक ये सारे काम करतीँ रहेँगीँ तभी तक रौनकेँ लगी रहेँगीँ ..
उस के बाद तो खुदा मालिक है
मैक्डोनाल्ड बर्गर ज़िँदाबाद ..होगा ! :)
- लावण्या

मीत said...

इतनी सारी स्वादिष्ट चीजो के बारे में पढ़कर मुह में पानी आया जा रहा है...
लेकिन साथ ही आपकी एक-एक बात सही है...
बहरहाल चलिए आपने अपने ब्लॉग के जरिये हमे इतनी सारी खाने की चीजों से रू-ब-रू तो करा ही दिया, वो भी आपके हाथ की बनी हुयी

कुश एक खूबसूरत ख्याल said...

अपनी बात कहने का अंदाज़ बढ़िया है... पकवान निश्चित रूप से मुँह में पानी ले आते है.. पढ़ते हुए उनकी महक भी ली थी..

आपकी बात सही है.. हालाँकि हमारे घर में सिर्फ़ त्योहारो पर ही नही आम दिन भी पापा, मम्मी की मदद करते थे.. खुद हम भाई मम्मी की मदद करते थे.. हमारी कोई बहन नही है तो घर के काफ़ी काम हम भी करते थे.. यही वजह रही होगी.. की मुझे खाना बनाना बहुत पसंद है..

और अब भी मैं जब भी घर जाता हू अपनी भाभियो के साथ मिलकर खाना बनाता हू.. इस दीवाली पर बहुत कुछ प्लान किया हुआ है..

Zakir Ali 'Rajneesh' said...

सही कहा आपने। दादीजान के पास आपकी बातों का वास्‍तव में कोई जवाब नहीं है।

बहरहाल, देर से ही ईद की मुबारकबाद कुबूल फरमाएं।

डॉ .अनुराग said...

हम जिस समाज में रहते आए है बचपन से इन अजीब सी परम्परायो को देख रहे है ओर कामकाजी स्त्री की दोहरी दुविधा है उसे घर ओर बाहर दोनों को देखना है ,ऑफिस से आकर भी चाय ख़ुद बनाएगी उल्टा आपसे भी पूछ लेगी की चाय पीनी है .
वैसे नई पीढी में बदलाव आ रहा है खास तौर से अब के पतियों में....क्यूंकि घर एक सामूहिक जिम्मेदारी है ..ये समस्या दुर्भाग्य से वहां ज्यादा है जहाँ जोइंट फॅमिली है...

लवली said...

अन्तिम वाक्य छू गया ..मैं जब माँ से ऐसा कोई सवाल करतीं हूँ जिसका जवाब उनके पास न हो तो वे अख़बार के पन्ने उलटने लगती हैं ..भले ही २ दिन पुराना हो ..मुझे खीज आती है ..पर मैं थक जाने पर आराम से बैठ जाती हूँ सीधा फरमान जारी करती हूँ "जिसे जो चाहिए ख़ुद बना लो ,मैं इन्सान हूँ मशीन नही "

BrijmohanShrivastava said...

महिलायें यदि घर को अपना घर समझती है ,किसी के घर आने पर और उसका उचित स्वागत न होने पर अच्छा नहीं लगेगा यदि यह सोचती हैं इन छोटी छोटी बातों का प्रश्न ही कहाँ उठता है

saleem akhter siddiqui said...

rakhshanda sahiba
eid par aapka mazmoon lajawab hai. der hi sahi eid ki bahut sari mubarkbad aapko aur aapke ahle khana ko.

rakhshanda said...

आप सब का बेहद शुक्रिया, आपका प्यार और मुहब्बतें ही मेरे कलम को ताकत देती हैं....

अभिषेक ओझा said...

ईद की देर से मुबारकबाद... पिछले दिनों छुट्टी पर रहा. औरतों का ये हाल तो है ही पर जब वर्किंग औरत हो तो समस्या अपने आप हल हो जाती है. पर अभी ये दूर की बात है.

मीनाक्षी said...

हमने अपनी सभी दोस्तो को रमादान के दौरान खूब काम करते देखा है... नौकरी करके आने पर एक पल आराम न करके इफ्तार की तैयार, फिर तरावी के लिए जाना ..आने के बाद फौरन डिनर और सुबह की सहरी की तैयारी...धीरे धीरे बदलाव आ रहा है... घर के मर्द मदद करने लगे है... देर से ही ईद मुबारक..

bhoothnath said...

पता नहीं आप यहाँ कब से गूँज रहे हो....इस उपवन से आज गुजरना हो गया तो ये गूँज सुनाई पड़ी...हम तो धक् से रह गए....बड़ी देर करदी वैसे तो हमने आने..मगर यह बताते चलें कि मीठी-सी गूंजन हमें बड़ी अच्छी लगी....समय-बेसमय सुस्ताने इस उपवन में आया करेंगे......हमें पता है हम आए या नहीं आप तो इतना गुजेंगी......