Sunday, July 6, 2008

वो चाँद तेरे शहर का........The moon of your city













रात सोयी तो यही सोचकर थी की कल से अकेले बहार नही निकलूंगी लेकिन अजीब बात ये हुयी कि नमाज़ से फारिग होते ही बाहर जाने को दिल मचल उठा. पता नही क्यों बहन को साथ चलने के लिए कहने का भी ख्याल नही आया, और मैं बस उसे दरवाज़ा बंद करने का कहकर बाहर निकल आई.

कल के इतने खौफनाक वाकये के बाद भी मेरे अन्दर डर का दूर दूर तक कोई शायेबा था. लेकिन उस से ज़्यादा हैरान मैं तब हुयी थी जब थोडी दूर चलते ही वो मेरे सामने आगया था.

हम दोनों ही एक दूसरे को देख कर मुस्कुरा दिए थे.

फिर साथ साथ ही walk करते हुए उसने कहा कि अब मुझे डरने की कोई ज़रूरत नही है क्योंकि वो रोज़ सुबह यूँ ही मेरे साथ रहेगा.

मुझे उसकी बात अजीब सी लगी, थोड़ा गुस्सा भी आया इसलिए मैंने कह दिया की अगर आप ये समझते हैं कि मैं कोई डरपोक लड़की हूँ तो ये आपकी ग़लतफ़हमी है, अगर ऐसा होता तो आज मैं फिर से अकेले बाहर नही निकलती.

मेरी इस बात पर वो हंस पड़ा था और जल्दी से बोला थामैडम मैं ऐसा बिल्कुल नही समझता कि आप कोई डरपोक हैं, बस इसे आप मेरी तरफ़ से दोस्ती का बहाना समझ सकती हैं’. उसकी इस साफगोई पर मेरा सारा गुस्सा लम्हों में दूर हो गया था.

और फिर---वाकई हम दोस्त बन गए थे.

मेरे लिए वो ख़ास इसलिए भी था, कि स्कूलिंग के बाद से कॉलेज आने के बाद वो पहला लड़का था जिस से मैंने दोस्ती की थी, दोस्ती की पेश कदमी तो बहुत लोगों की तरफ़ से हुयी पर जाने क्यों कोई ऐसा लगा ही नही जिसे काबिल--एतबार समझा जाए, क्योंकि जिस तरह के लोगों से जिंदगी ने अब तक रोशनास कराया है,उसने मुझ से एतबार के मानी छीन लिए हैं,जिंदगी ने या तो बहुत अच्छे लोगों की झलक दिखाई, जिन्होंने अपनी अच्छाइयों से हैरान कर दिया या इतने बुरे लोगों से मिलाया जिनके खूबसूरत चेहरों के पीछे उतने ही बदसूरत चेहरे छिपे थे. अछे और बुरे के इसी confusion ने लोगों से दूरी बना कर रखने पर मजबूर कर दिया.

लेकिन जाने क्यों उस से मिल कर लगा कि वो बिल्कुल मेरे जैसा है,अच्छाई और बुराई का मिला जुला कॉम्बिनेशन.

उसका नाम प्रशांत था. वो हमीरपुर का रहने वाला था.आजकल उसकी फैमिली शिमला में ही मुकीम थी. ख़ुद वो सोलन में जे.पी. इंजीनिअरिंग कालेज का फाइनल इयर का student था.

वो हँसता बहुत था और हँसते हुए वो शिमला के खूबसूरत मंज़र का एक हिस्सा मालूम होता था. मैं चूंकि ज़्यादा नही हंसती, इसलिए उसका हँसता हुआ चेहरा मुझे बहुत अच्छा लगता था.

हम हर टॉपिक पर बात करते थे. मिजाज की बात करूँ तो वो मुझ से बहुत मुख्तलिफ था.

जहाँ मुझे कुदरती नजारों , बोलती हुयी खामोशियों से इश्क था.

उसे ज़माने की तेज़ रफ्तारी attract करती थी, जहाँ मुझे लिटरेचर की पुरस्रार(रहस्मय) दुनिया से मुहब्बत थी, वो टेक्नोलॉजी और इन्टरनेट का दीवाना था. तेज़ रफ़्तार ड्राइविंग उसका मन पसंद मशगला था.

लेकिन जो बात मुझे हैरान करती थी वो ये कि जहाँ मैं उसकी आदतों को जानने के बाद उसकी खामियां(कमियां) गिनवाती थी और criticize करने की हद तक जा कर नसीहतें भी करने लगती थी, वहीं वो मेरे सारे शौक और आदतों को बड़े ध्यान से सुनता था और उस से मुतास्सिर भी नज़र आता था. शायद यही वजह थी कि धीरे धीरे मैं उस से हर टॉपिक पे बड़े आराम से बात कर लेती थी.

हम सब ने कुफरी जाने का प्रोग्राम बनाया, वहीं से हमारा इरादा सेब और खुबानी के बागों को देखते हुए चैल में बने दुनिया के सब से ऊंचे क्रिकेट ग्राउंड को देखने का था.

मैंने उसे इस के बारे में एक रोज़ पहले ही बताया था, और दूसरे रोज़ हम सुबह सवेरे ही निकल पड़े थे.

पर उस लम्हे तो मैं खुश होने के साथ साथ हैरान भी रह गई थी जब कुफरी पहुँचने पर मैंने उसे bike से उतारते देखा.

वो दूर से मुझे देख कर मुस्कुराया था.

मैंने घबरा कर अपना आस पास देखा और उसे दूर रहने का इशारा किया था. लेकिन ये मेरी ग़लतफ़हमी थी. उसका इरादा हमारे साथ अन्दर जाने का था ही नही.

घूम फिर कर जब हम वापस आए और चैल की तरफ़ चले तब रास्ते में उसकी बाइक भी हमारे साथ थी.

सेब आडू और खुबानी के बागों को देख कर दिल खुशी से खिल उठा था.

ऐसे नजारे देख कर कुदरत की जादूगरी का अहसास बड़ी शिद्दत से होता है. गो की फल अभी छोटे छोटे ही लगे थे लेकिन उनकी तादाद इतनी ज़्यादा थी की दरख्तों के पत्ते फलों की बा-निस्बत कम दिखायी दे रहे थे. जब ये अपने पूरे शबाब पर होते होंगे तब इन मकामों की खूबसूरती का सिर्फ़ तसव्वुर ही किया जासकता था.

चैल प्ले ग्राउंड पहुंचकर थोडी मायूसी का सामना करना पड़ा था. ग्राउंड आम लोगों के लिए बंद था. ये ग्राउंड ७५०० फुट की ऊंचाई पर बना है. ये आर्मी के कंट्रोल में आता है और इसके सारे गेट पर ताले लगे हुए थे लेकिन हैरानी की बात ये थी लोग बड़े आराम से गेट फलांग कर अन्दर जारहे थे और कोई सिक्यूरिटी गार्ड वहां नज़र रहा था ही आर्मी के किसी बन्दे का नाम--निशान वहां था.

दुःख इस बात का हुआ कि जब सारे लोग इसतरह बाढ़ और गेट फलांग कर जारहे थे तो इसे लोगों के लिए खोला क्यों नही जारहा था?

अगर इस तरह अन्दर जाते हुए किसी के साथ कोई हादसा हो जाता तो इसका जिम्मेदार कौन होता ?

सब को अन्दर जाते देख हम से नही रहा गया और हम किसी किसी तरह अन्दर पहुँच ही गए, लेकिन अन्दर का नज़ारा देख कर दिल खुश हो गया. दुनिया के सब से ऊंचे प्ले ग्राउंड में ख़ुद की मौजूदगी ही फख्र का अहसास पैदा कर रही थी.

हम ने काफी देर वहां पर मस्ती की, क्रिकेट फुटबॉल, खेला, कुश्ती लड़ी, झूला झूले. दौड़ लगायी, वो हमें दूर से देख कर मुस्कुराता रहा.

वापसी पर थकन के मारे बुरा हाल था, दूसरे रोज़ नमाज़ पढ़ कर मैं सो गई, हिलने की भी हिम्मत नही थी.

लेकिन उसके बाद अगली सुबह जब उसने मुझे बताया की कल सुबह उसने पूरे दो घंटे मेरा इंतज़ार किया था तो मैं हैरत से उसका मुंह देखती रह गई, इतनी दूर बाइक चलाने के बाद भी वो walk के लिए आया था, सचमुच काबिल--तारीफ़ थी उसकी हिम्मत और आदत….

दो तीन रोज़ के बाद हमें मनाली जन था, और इस बीच उसने अपनी जिंदगी के बारे बचपन से लेकर अब तक की सारी बातें मुझ से शेयर कर डाली थीं, जब उसके बारे सब कुछ जाना तो अहसास हुआ कि उसकी खूबसूरत हँसी के पीछे कितने ज़ख्म भी छिपे हैं, मैं, जिसे लगता था कि दुःख मेरे हिस्से में कुछ ज़्यादा ही आए, उसकी जिंदगी की tragedy ने मेरे ख़यालात ही बदल दिए, दुखों को थपकी दे कर छोटी-छोटी खुशियों को अपने दामन में समेट लेना ही जिंदगी है, ये मैंने इन चंद दिनों में उस से सीख लिया था…….to be continued

14 comments:

mehek said...

sach rakshanda ji, aap bahut lucky rahi jo itna pyara sa dost apko vaha mila,aur nazariya bhi kitna sahi,choti choti khushiyon ko hi samet lena chahiye,ek muskan ke piche hazar gum chupekaha kisi ko raas aate hai na tumhe na hame.ek baat kahu,aapki shimla yatra ki sab se yadar post lagi ye hame.ye choti khushiyon ki nemat aapke saath yuhi barkarar rahe.

mehek said...

yadar isko yaadgar padhe

मुनीश ( munish ) said...

Really a nice sweater Rakshu ji. Apki pasand ka javaab hi nahin.

DR.ANURAG said...

आपकी दास्तान सुनकर अपना लिखा एक पुराना शेर याद आ गया....

अजीब शख्स था वो जाते जाते
भीड़ में भी तनहाइया दे गया

अगली किस्त के इंतज़ार में ......

SUNIL DOGRA जालि‍म said...

बहुत खूब.. आका लेख पढ़ कर कई यादें ताज़ा हो गयी..

Manish Kumar said...

achcha laga padh kar. par aap itne oonnche playground par gayi to wahin ki tasweer bhi laga detin to behtar hota.

राज भाटिय़ा said...

बहुत खुब,लगता हे हम भी इसी कहानी के एक पात्र हे, बहुत पुरानी याद दिला दी जब हम १०,१२ साल के होगे,अगली पोस्ट का इन्तजार रहेगा.

Udan Tashtari said...

बहुत बहुत मुबारक. एक ऐसा दोस्त मिला जिससे आपकी खुशियों में इजाफा हुआ-और क्या चाहिये. अगली कड़ी का इन्तजार करते हैं.

अभिषेक ओझा said...

दोस्त होते ही ऐसे हैं... होते ही इसीलिए हैं की चेहरे पर मुस्कराहट दे जाएँ... बहुत अच्छा सफर लग रहा है आपका... इसे तस्वीरों से और सवारें तो अच्छा रहेगा... और हाँ अपने दोस्त की भी फोटो लगाइए...

महेंद्र मिश्रा said...

छोटी-छोटी खुशियों को अपने दामन में समेट लेना ही जिंदगी है, ये मैंने इन चंद दिनों में उस से सीख लिया था…

bahut sundar anubhav or achchi post. dhanyawaad.

ग़ुस्ताख़ said...

आपका सफ़र अच्छा रहा होगा.. दोस्त भी मिल ही गया... चलिए आपके लिए एक शेर कहूंगा..
सैर कर दुनिया की गाफ़िल, ज़िंदगानी फिर कहां
ज़िंदगानी फिर रही तो नौजवानी फिर कहां?

Lovely kumari said...

sundar chitra hain,aur usse bhi sundar tumhare likhne ka tarika.

राकेश जैन said...

hume sabse behtar to apka, kisi bhi bat ko kehne ka saleeka hi lagta hai...bahut achha.

डा. फीरोज़ अहमद said...

बहुत बहुत मुबारक.