Thursday, July 10, 2008

रंज-ऐ-सफर की कोई निशानी तो साथ हो.........



शजर न बेच कोई सायबान रहने दे
गए
ज़माने का कोई निशान रहने दे

तुझे नही है ज़रूरत,तू क्यों गिराता है
मेरे
लिए तो मेरा अस्तान रहने दे

सजी हुयी हैं जो कब से बस्तियां न उजाड़
ये
ख्वाहिशों की नमो के निशाँ रहने दे

तेरा तो तीर भी भारी है इस परिंदे से
न खींच ज़ोर से इतनी कमान रहने दे
खार आख़िर-ऐ-शब् का मिजाज जो भी हो
दिलो
दिमाग को उसका ध्यान रहने दे

मैं अबकी बार किसी से मदद न मांगूंगा
भंवर
के रुख पे मेरा बादबान रहने दे


मनाली जाते हुए मैं उसके साथ हुयी उस ट्रेजडी के बारे में सोच रही थी जिस में नई बात कोई नही थी.
बड़ी
आम सी कहानी थी,उसकी जिंदगी में एक लड़की आई थी.ये उन दिनों की बात थी जब वो शिमला में interence के इम्तेहान की तय्यारी कर रहा था. एक मकामी लड़की से उसे मुहब्बत हो गई. दोनों ही एक दूसरे के लिए बेहद संजीदा थे.


तभी जाने क्या हुआ. लड़की के लिए कोई रिश्ता आया. रिश्ता दिल्ली की एक अमीर फैमली का था. लड़की पहले तो काफी रोई, शोर मचाया लेकिन फिर राज़ी हो गई. धीरे धीरे उसकी निगाहें ही बदल गयीं.
आखिरी
मुलाकात में उसने साफ़ लफ्जों में कह दिया की तुम्हें establish होने में अभी सालों लगेंगे और मेरे मां बाप इतना लंबा इन्तेज़ार नही कर सकते.

प्रशांत
ने कहा था कि जाने कितने दिन लग गए थे उसे उसकी बेवफाई का यकीन करने में. लेकिन धीरे धीरे उसने खुदको इस दुःख से बाहर निकला और पूरी तरह पढाई में डूब गया. नतीजे में उसे शानदार कामयाबी मिली।
लड़की की शादी हो गई और वो सोलन चला गया. अपने कालेज का वो topper रहा. वो उस लड़की को पूरी तरह भूल गया.
तभी
तो —तीसरे साल अचानक शिमला में जब वो लड़की उस से मिली तो दिल में जैसे कोई जज्बा ही नही था.

हाँ, उसके बारे में सुनकर उसे दुःख ज़रूर हुआ था.
वो
दिल्ली से वापस आगयी थी. उसका शौहर अय्याश और शराबी था. शराब पीकर उस पर हाथ उठता था.
ससुराल वाले भी इन सब का जिम्मेदार उसे ही समझते थे.
वो अब पछता रही थी तभी उस से माफियाँ भी मांगती रही लेकिन वो तो सब कुछ भूल चुका था. उसने बताया था कि लाख चाहने पर भी मेरे दिल में ऐसा कोई जज्बा नही जागा था.
मैंने पूछा ‘क्यों? तो उसने मुस्कुरा कर कहा था..’पता नही, मुझे लगता है हम जिसे प्यार समझ रहे थे वो प्यार था ही नही, कम उमरी का attraction और कुछ नही…।
मुझे हँसी आगई थी…पता नही सच क्या था लेकिन जिंदगी के उसके नज़रिए ने मुझे काफी मुतास्सिर किया था।


मनाली आकर बहुत अच्छा लगा. यहाँ पहले भी दो बार आचुकी थी, और हमेशा ही इसकी खूबसूरती दिल की वादियों में खामोशी से उतर गई थी.
मौसम काफ़ी सर्द था. बारिश लगातार हो रही थी. लेकिन चूँकि आस-पास के सारे मकामात, चाहे वो कुल्लू रहा हो, मणिकर्ण गुरुद्वारा या रोहतांग की बर्फ, दोनों बार देख चुके थे इसलिए इस बार फ़ैसला यही हुआ की कहीं जाने का रिस्क नही लेंगे.
दिन भर आराम और शाम को माल रोड पर चहल कदमी.
और
उस शाम हम माल रोड पर ही घूम रहे थे जब उसने मुझे ‘हेल्लो कहा था.

एक बार फिर मैं हैरान रह गई थी. मुझे बिल्कुल उम्मीद नही थी की वो यहाँ भी आ सकता है.
लेकिन
अच्छा भी लगा. मनाली जाते हुए मैं उस से मिल भी नही सकी थी. और यहीं से हमें वापस देहरादून चले जाना था.

रोज़
होती बारिशों की वजह से मैं मोर्निंग वाक् पर भी नही जा पाती थी.
ऐसे
में शाम को माल रोड पर सिर्फ़ उसकी झलक दिखायी देती और मैं वापस आजाती थी.
लेकिन पता नही क्यों, मैंने महसूस किया की वो कुछ बदला बदला सा लग रहा है. अजीब सी उदासी का शिकार…
न वो मुस्कराहट नज़र आती थी न ही हँसी…..पूछने का कोई मौका ही नही मिल पा रहा था.
इत्तेफाक
ही कहिये, जाने से दो रोज़ पहले उस सुबह बारिश नही हो रही थी. मैं ममा से पूछकर निकल आई थी. जाने क्यों यकीन था कि वो ज़रूर मिलेगा और मेरा यकीन सही साबित हुआ था.

वो
खामोश था, न कोई सवाल न कोई बात…
मुझे
उलझन सी होने लगी.

आख़िर तुम्हें हुआ क्या है? मैं झुंझला गई थी.
उसका सर वैसे ही झुका रहा. मुस्कुराने की कोशिश में जो मुझे नज़र आई, वो मुस्कराहट तो हरगिज़ नही थी।
‘प्रशांत, प्लीज़ हम दोस्त हैं..क्या मुझ से भी शेयर नही करोगे?
मेरे
इतना कहते ही अजीब बात हुयी थी…
’हम दोस्त नही हैं..’अचानक उसने आँखें भींजते हुए ज़ोर से कहा था..’तुम चाहे अपनी फीलिंग्स में ईमानदार हो लेकिन मैं नही रह सका, आई ऍम सॉरी, मैं जानता हूँ तुम मुझ से नफरत करोगी लेकिन अगर मैं अपनी फीलिंग्स इमानदारी से नही बताता तो तुम्हारे साथ बेईमानी करता और कभी चैन से नही रह सकता था.’

और
फिर….

जो कुछ उसने कहा उसे शायद लिखने की ज़रूरत नही है…..
मैं नही कह रही की उसने ऐसा कहकर कोई गुनाह किया लेकिन उसने मेरे अन्दर बने हुए ख़ुद के खूबसूरत बुत को पाश-पाश कर डाला.
बहुत
देर लगी थी मुझे इस शाक से निकलने में…

उसने हमेशा मुझे हैरान किया था और हमेशा के लिए हैरान कर गया.
मैं बिना कुछ कहे, उसी सकते की कैफियत में वापस आगई थी.
मैंने
पलट कर उसे देखने की एक बार भी कोशिश नही की….

जिंदगी कदम कदम पर इतना हैरान करती है की कभी कभी हर एक शै पर धोके का गुमान होता है.
लोग जैसे दिखते हैं, वैसे क्यों नही होते?
दिल
जिस बात की गवाही देता है, वो ग़लत क्यों साबित होती है?
सुनहरे मौसम में धुंध कहाँ से आजाती है?
बेपनाह शोर में सन्नाटे से क्यों उतर आते हैं?
कहीं ऐसा न हो, कहीं वैसा न हो,गुमान, धोका, सेराब ही क़दमों से क्यों लिपटते हैं?
कहीं कोई तो जगह हो जहाँ यकीन और ऐतबार की दुनिया बस्ती हो.

तीसरे
दिन हमारी वापसी थी।
रास्ते भर वो जामिद खामोशी मेरे साथ रही, कैमरे से वो सारी यादें मिटा डाली थीं मैंने जो मुझे उसकी याद दिलाती थीं….
कैसा
शहर था वो, और कैसे उस शहर के लोग….
दोस्ती
का हाथ बढ़ा कर ख़ुद ही दोस्ती का मान छीन लेते हैं.

यकीन की खुशियाँ दे कर बे-ऐतबारी के दुखों से झोली भर देते हैं….

ये तेरा शहर! तेरे शहर की ये रीत है क्या?
किसी अनजान को ख़ुद अपना बनाना ऐ दोस्त!
और फिर खू गरे इल्ताफ़ इनायत कर के
इक सुलूक-ऐ-सितम आगीं से मिटाना ऐ दोस्त

मिटाते मिटाते ये भी याद न रहा कि उसकी तस्वीरें मिटाते हुए मैंने सिर्फ़ अपनी ही नही फैमली की तस्वीरें भी मिटा डालीं हैं. सब हैरान और नाराज़ भी थे कि वो तस्वीरें कहाँ गई?
थोड़ा सा दुःख मुझे भी था…..रंजे सफर की कोई निशानी तो साथ होनी चाहिए थी ना…..

(यही वजह है की मैं चाह कर भी कोई अच्छी तस्वीर अपनी पोस्ट के साथ नही लगा पायी, जिसका अफ़सोस मुझे भी है…)

20 comments:

advocate rashmi saurana said...

aap bhut achha likhti hai. or aaj to aesa likha hai ki aankho se aansu aa gaye. bhut sundar. likhati rhe.

अभिषेक ओझा said...

सारी फोटो क्यों डिलीट कर दिया? बाकी फोटोस तो रखनी थी... खैर चलिए ऐसा होता रहता है... मैं भी यही कर चुका हूँ एक बार. कुछ दिनों में वो कहानी भी आने वाली है ब्लॉग पर. आप तो आसानी से उठ कर चली आई... मुझे बहुत देर तक समझ ही नहीं आया था की करूं क्या. गनीमत है मेरे साथ वाली घटना फोन पर हुई थी और उस समय फ़ोन सामने वाली ने ही काट दिया था और फिर कुछ सोचने का वक्त मिल गया था.

कंचन सिंह चौहान said...

Kabhi kabhi cheejo.n ko as it is lena chahiye Rakshanda Ji...! aap bahut paq jazbaat rakhti hai.n... aap bahut clear thi, lekin itna jyada hurt kyo kiya khud ko..? kabhi us shakhsa ki bhi taraf se soch kar dekha hota...!

vo tuti hui ek shakh tha, jo har ped par sahara dhu.ndh raha tha..! sab ke apne apne haalat hote hai

aur fir ek baat aur kahu.n kabhi bhi aage se buri yado ko bhi mitana nahi, har shai ka apna vazud hota hai, apni keemat hoti hai, ye sare experience meel ke patthar hai, manjil tak pahunchane me bade kaam aate hai.n

अनुराग said...

क्या कहूँ ?आदमी भी आदमी नही रहता जज्बात में .....फ़िर भी यही दुनिया है .यही रहना है....आप जज्बाती न बनिये,किसी का लिखा एक शेर है .... याद नही किसका है ....

बहुत मुश्किल है समझना ओर समझाना इसे
अबसे पहले जमाना इतना पेचीदा न था

दिनेशराय द्विवेदी said...

आप की कहानी (आप बीती) की सचाई पसंद आई। मुंशी प्रेमचंद जी ने संजीदगी के साथ लिखा था। प्रेम साहचर्य से उत्पन्न होता है। यही कारण है कि परंपरागत शादियों में से अधिकांश अखीर तक साबुत रहती हैं और मुहब्बत का जज्बा गहरा होता चला जाता है। वैसे भी शादी एक दोतरफा मामला है, एक तरह का कंट्रेक्ट है जिस में दोनों को कुछ पाने के लिए बहुत कुछ देना पड़ता है। जब कि मुहब्बत एक तरफा मामला है। किस्मत से ही मिलती है मुहब्बत के बदले मुहब्बत का सिला। हाँ गज़ल बहुत सुंदर है।

neelima sukhija arora said...

बहुत ईमानदार और भावुक स्वीकारोक्ति, सचमुच जिन्दगी में बहुत सी चीजें ना चाहते भी हो जाती हैं।

Udan Tashtari said...

रंजे सफर की कोई निशानी तो साथ होनी चाहिए थी ना…..

Ab nahi rakhi, to nahi rakhi. Jyada dukhi na ho.

Waise padhkar takleef to khoob hui par apka aatamvishvas aur vivek jo gawahi de, usase behtar kuch bhi nahi ho sakta aapke liye. Humesha swa vivek se hi nirnay lena chahiye. Anekon Shubhkamanayen.

महेंद्र मिश्रा said...

ये तेरा शहर! तेरे शहर की ये रीत है क्या?
किसी अनजान को ख़ुद अपना बनाना ऐ दोस्त!
और फिर खू गरे इल्ताफ़ इनायत कर के
इक सुलूक-ऐ-सितम आगीं से मिटाना ऐ दोस्त.
गज़ल बहुत सुंदर है.

मुनीश ( munish ) said...

first time.. i must say first time any blog post has made my eyes moist with saline water .if u see my old post on manali, u will realize that there was hardly any long Vaqfa between our trips to that region and for some reasons i cudn't publish pics of my trip though usually im very fond of pasting pics of my trips. anyway , u shudn't have been so senti baby 'cos life is like dat only.

Manish Kumar said...

अपनी पिछली टिप्पणी में मैंने तसवीर ना रहने की बात कही थी। अब समझ आ गया।

जिस भावना से आपने दोस्ती का हाथ बढ़ाया था वो ये नहीं समझ सका या यूँ कहे कि उसके दिल ने समझ कर भी उसे अनसुना कर दिया पर कम से कम वो अपनी जज़्बातों के साथ ईमानदारी से पेश तो आया। उसकी निगाह से सोचिए तो उसे ये मुगालता तो नहीं रहेगा कि अपने दिल की बात वो आपसे ना कह सका। चाहे उसकी इस छवि ने आपको निराश ही क्यूँ ना किया हो पर जब आप कुछ दिन बीतने के बाद इस वाक़ये के बारे में सोचेंगी तो शायद इतनी खलिश दिल में ना रहे जितनी अभी है।

आज से करीब दस साल पहले मैं मनाली गया था और वहाँ से शिमला लौटा था। मनाली की सुंदरता के सामने शिमला बहुत फीका लगा था। गुलाबो वैली की हसीन बर्फ, सलांग घाटी की मखमली दूब और व्यास नदी का कलकल बहता जल मन में रच बस सा गया था। आपने वो यादें ताज़ा करा दीं।

rakhshanda said...

आप सब का दिल की गहराइयों से शुक्रिया, ये आप ही हैं जिन से मैं अपना हर दर्द बाँट लेती हूँ, बड़ा ही गहरा रिश्ता बन गया है आप सब का मुझ से...बखुदा इसे तोड़ीयेगा नही...कोई रिश्ता बड़ी मुश्किल से बनता है लेकिन जब टूटता है तो दिल में वो दर्द होता है जो भुलाए नही भूलता...मैं मानती हूँ की वो अपने आप में ईमानदार रहा होगा लेकिन जिस दोस्ती को मैंने इतना कीमती समझा था जिसे बहुत ही एहतेराम से दिल की गहराईयों में जगह दी थी, उसे उसने कितनी आसानी से तोड़ दिया...और आज ये अहसास करा दिया कि ये दुनिया एइत्बार के काबिल नही...लेकिन जैसा कि कंचन जी ने कहा कि यही जिंदगी है और ऐसे वाकयात ही हमें आगे बढ़ने की ताकत देते हैं दुनिया को समझने में हमारी मदद करते हैं तो ....क्या कहूँ...बस ठीक है...यही था मेरा सफर, दुआ कीजियेगा कि ऐसा सफर मेरा या आपका या किसी का कभी न हो...एक बार फिर शुक्रिया...

राज भाटिय़ा said...

बहुत ही भावुक लेख हे आप का , अच्छा किया यादे मिटा दी(केमरे से) यह यादे जीना दुश्वर कर देती हे, फ़िर से ऊठो सोचो एक सपना था जो टुट गया,

pallavi trivedi said...

आप इतनी भावुकता से न सोचें इस वाकये को....ऐसा होता है की कभी न चाहते हुए भी दिल में फीलिंग्स आ जाती हैं! कम से कम उसने ईमानदारी से आपको अपनी फीलिंग्स बता दी!अब फैसला आपका है आपको दोस्ती रखनी हैं या नहीं!वैसे खराब तो लगता है जब एक दोस्ती सामने वाले की तरफ से केवल शुद्ध दोस्ती नहीं रहती! but it happens in life....so be coooool and smile.

अंगूठा छाप said...

ये जिंदगी है रक्षंदा। यही इसकी कशिश है।
तुमने वही किया जो सही था। धीरे धीरे तुम इससे उबर जाओगी।
फिर यही स्मृति एक मीठी चुभन में तब्दील हो जाएगी।

फिलहाल कैमरे से भले डिलीट कर दी हों,

उसकी हजार हजार तस्वीरें आंखों में घूम रही होंगी अब भी।
है ना रक्षंदा...

अंगूठा छाप said...

पल्लवी ने एकदम सही कहा है...

समय said...

तुम्हारा नाम कहीं ब्लाॅग के सिलसिले में ही कई बार सुन चुका था ...आज आके देख रहा हूं तो महसूस कर पा रहा कि आखिर लेखन का ये प्रवाह ही वो वजह है कि लोग रक्षंदा को खूब पढ़ना चाहते हैं।
तुम जिस ढंग से अपने जज्बातों को बयां करती हो वो निहायत खूबसूरत है रक्षंदा।
तुम अपने बारे में कुछ बताओ न कभी कि तुम्हारे घर-परिवार में लेखन से किसी का जुड़ाव रहा है या.... तुम ...तुम इतना बहाव वाला कैसे लिख पाती हो रक्षंदा?

ये सच है कि जिंदगी है तो घटनाएं हैं ...लेकिन उनका बयां करने का बूता हरेक में नहीं...

कविताएं तो बहुत हो रही आजकल ...तुम हो सके तो कहानी लिखना शुरू करो ... और हां, कहानी से याद आया एक नई-नई लेखिका इन दिनों बड़ी तेजी से उभर कर आई हैं नाम है - स्नोवा बार्नाे। तुम उसकी कहानियां जरूर पढ़ना। पिछले चार-पांच माह के हंस और नया ज्ञानोदय पलट लेना। तुम देखोगी कि अहसास बयां करने की ताकत क्या होती है। दुनिया आज स्नोवा के लिखे की कायल है तो यूं ही नहीं। तुम पढ़ना उसे... और अन्यथा मत लेना रक्षंदा ...मुझे तुममें संभावनाएं दिखीं तो ये सब कह दिया। गुड बाय। जैराम जी की।

राकेश जैन said...

Rakshanda g, ye matter thoda chintneeya hai, main nahi janta kee aap mujhse badi hain ya chhoti, par is lekh se laga ki kahin jeevan ke anubhavon ke priti aparipakvata rah gai hai,. apko is bat ko itna serious nahi lena chahiye, ye zindagi hai, aap to dhanyabad ki patra ho, ki kisi ke dil me apke priti itna pak jazba paida hua, apki jagah main hota to to us ladke se shukriya kahta, aur chunki main uska hum khayal nahi hota jaise aap nahi thi, main is rah gai kami ke lie usse muafi zurur mangta. uski wo jane, hume apne jeevan ko sundar banaana hai to yahi behtar upay hai.. all the best!!!

geet gazal said...

vah . vah . jawab nahi hai... great

Anonymous said...

Rakshanda,
What a lively missive, Infact you made me to read your blog all the time. I am in the US and was looking for something like this blog and fortunately I came across yours and Manish's blog.

Looking forward to see more from you
Best wishes
Vineet ( Fairfax-VA- USA)

सुरेन्द्र कुमार ढलेटा said...

सर्च इंजन में शिमला ढूँढ़ते ढूंढते यहाँ पहुंचा. सर्व प्रथम आपका शिमला के सफ़र का लेख पढ़ा और पढता ही गया. मैं स्वयं शिमला का रहने वाला हूँ. और आपने जिस प्रकार शिमला की अनेक जगहों का व्याख्यान किया है, मैं उसकी तस्वीर बनाता रहा. आपके इस नयी मित्रता की कहानी पढ़ कर उत्सुक्ता हुयी फिर दुःख भी.

सम्बन्ध चाहे कहीं भी बने - वे साथ में दूसरे व्यक्ती का अतीत भी साथ में लाते हैं. जिस प्रकार आपने पहले लेख में कहा था, की वह इंसान अच्छा भी था और बुरा भी, यही मिश्रण इंसान को पूरा बनता है, इसी प्रकार जीवन के अच्छे बुरे हादसे संपूर्ण जीवन बनाते हैं. जीवन सभी रंगों से बनता है. इसमें कला या सफ़ेद नहीं हो सकता. मुझे इस बात का दुःख अधिक है की आप वापिस एक मित्र न ला पायी.

खैर कभी शिमला आना हो तो बन्दे को याद कीजियेगा, आपको मेरे गांव - जो कि शिमला से करीब १२० कि मी दूर है - का निमंत्रण है. आप सेब के बागों में व हसीं वादियों में खो जाइए.