Friday, May 2, 2008

माँ की ममता , ओरत की ताक़त या कमजोरी?


कुछ दिन पहले बाबा के एक दोस्त कोलकाता से आए थे.सेन अंकल पेशे से मनोचिकित्सक हैं.जब हम कोलकाता में थे तो अक्सर उन से मिलना होता था बाबा का,लेकिन जब से हम ने वो शहर छोड़ा ,बस कभी कभार फ़ोन पर ही बात होती हैं.बाबा अक्सर उन्हें याद करते रहते थे.दोस्ती का रिश्ता उधर भी उतना ही गहरा था तभी तो इतनी बिज़ी लाईफ से वक़्त निकाल कर वो उनसे मिलने यहाँ तक चले आए.
अब ज़ाहिर सी बात है कि जब वो उनके लिए यहाँ तक आगये तो हमारे बाबा का सारा समय उन्हीं के नाम हो गया था.अपने बाबा से बस एक यही शिकायत रहती है मुझे,जब भी उनके दोस्त मिल जाते हैं तो वो अपनी इस दोस्त को पूरी तरह भूल जाते हैं.
बहरहाल इस बार मुझे उन से उतनी शिकायत तो नही थी क्योंकि एक तो उनके दोस्त इतनी दूर से सिर्फ़ उन से मिलने आए थे और दूसरे डा.सेन अपने आप में इतने अच्छे इंसान हैं कि उन से मिलकर बन्दा उनकी ज़हानत और अखलाक(व्यवहार ) से मुतास्सिर(प्रभावित)हुए बिना नही रह सकता.
उनके बारे में डिटेल से लिखने को तो बहुत कुछ है लेकिन एक तो पढने वालों के लिए काफी लंबा हो जाएगा,दूसरे उस टॉपिक के लिए जगह कम पड़ जायेगी जिसने मुझे आज लिखने पर मजबूर किया है.
ये इत्तेफाक ही था कि जब वो दोनों(डा.सेन और बाबा) ये बातें कर बाहर बरामदे में कर रहे थे तो मैं ड्राइंग रूम में पढ़ रही थी.उन दोनों की आवाजें अन्दर तक आरही थीं,बातचीत का टॉपिक माँ और उसकी ममता थी. टॉपिक ने मुझे attract किया तो जाने कैसे मैं मतवाज्जाह हो गई. हो सकता है बहुत से लोगों को ऐसा लगे कि ये ये manners के खिलाफ है लेकिन कभी कभी ऐसा हो जाता है.
डा.सेन इस बात पर बड़ी मजबूती से कायम थे कि इस दुनिया में खुदा की खुदाई से तो बन्दा एक बार मुनकिर(नास्तिक)हो सकता है लेकिन माँ की ममता से नही.
सदियाँ बीत जाएं,दुनिया कितनी ही करवटें बदल डाले लेकिन माँ की ममता उतनी ही खालिस(शुद्ध)और बेलौस(निस्वार्थ)आज भी है जैसी सदियों पहले थी और ऐसी हजारों सदियों के बाद भी वैसी ही रहेगी.
बातचीत और आगे बढ़ती रही.इन्हीं बातों में उनहोंने अपना एक केस बाबा को सुनाया.जिसे सुनकर मैं अन्दर तक लरज़ गई.उनके इस केस ने मुझ पर कैसे असरात छोडे ये मैं नही लिखूंगी, क्योंकि ख़ुद अभी तक मैं ही नही जानती की मैं क्या सोच रही हूँ.
केस
ये केस एक ऐसी लड़की का था जिसे उसके बाप और भाइयों से ज़मीनी चली आरही दुश्मनी के कारण उनके दुश्मनों ने अगवा(अपहरण)कर लिया था. हमेशा से ऐसा होता आया है,आपसी दुश्मनियों का खामियाजा ओरत को भुगतना पड़ा है,क्योंकि बुजदिल मर्दों के लिए हमेशा से ओरत की जात आसान टारगेट रही है.
बहरहाल लगभग बीस दिन तक वो उसका गैंग रेप करते रहे और फिर अधमरी हालत में एक दिन उसके घर के दरवाज़े पर फ़ेंक गए.
भाई educated थे और उन्हें अपनी बहन से मुहब्बत भी थी,वरना आम हालात में ऐसी हालत के बाद नाम--निहाद (तथाकथित)इज्ज़त्दार खानदान अपनी बहनों और बेटियों को अपनाने तक से इनकार कर देते हैं .
लड़की लगभग पागल हो गई थी.कई बार उस ने खुदकशी की नाकाम कोशिश भी की.तब उसका एक भाई उसे डा.सेन के पास लेकर आया था.
डा.सेन उसका इलाज करते रहे और काफी हद तक कामयाब भी रहे थे लेकिन तभी पता चला कि वो लड़की गर्भवती है. घर वालों ने बच्चा अबार्ट कराना चाहा लेकिन doctors ने उसकी कमज़ोर सेहत को देखते हुए अबार्शन से साफ इंकार कर दिया.उनका एक राय में कहना था कि अबार्शन की सूरत में उसकी जान को पूरा खतरा है.
लेकिन वो लड़की इस बात के लिए बिल्कुल तैयार नही थी.बड़े ही पेचीदा हालात थे. वो लड़की जो ज़िंदगी की तरफ़ बड़ी मुश्किल से लौट रही थी,एक बार फिर पागल सी हो गई. कई बार उसने ख़ुद को और होने वाले बच्चे को नुकसान पहुँचाने की कोशिश की.
डा.सेन को उसे अपने अस्पताल में admit करना पड़ा. बार बार उसके साथ सिटिंग लेनी पड़ी.
भाइयों ने अंत में बड़ी मुश्किल से ये फ़ैसला किया कि बच्चे को जन्म लेने के बाद किसी यतीम खाने में दे दिया जाएगा.
डा.सेन को कुछ महीने उसे सँभालने में बड़ी मुश्किल हुयी लेकिन धीरे धीरे वो हैरत अन्गेज़ तौर पर संभलती चली गई.
उसने ख़ुद को या बच्चे को नुकसान पहुंचाने वाली हरकतें करना बंद कर दी थीं.
अपनी डाईट भी वो ठीक से लेने लगी थी.
डा.सेन हैरान तो थे लेकिन जल्दी ही उनकी ये हैरत तशवीश में बदल गई.
हुआ यूँ कि एक दिन उस लड़की ने डा. से अपनी delivery की डेट पूँछी .डा. ने मुस्कुराते हुए उसे डेट बताई और उसका मन बहलाने के लिए बच्चे के बारे में बातें करने लगे. उन्होंने देखा कि लड़की का चेहरा किसी पत्थर की तरह सख्त हो गया था. आँखें एक शून्य में स्थिर हो गई थीं ऐसा लग रहा था जैसे वो कोई भयानक मंज़र देख रही हो.
फिर उसके होंठ धीरे धीरे हिलने लगे थे. ''ये उन्हीं दरिंदों का बच्चा है ना डॉक्टर ,जिन्होंने मुझे दिन रात नोचा खसोटा है,मैं चीखती रही ,तड़पती रही और वो रात रात भर मुझे भेडियों की तरह नोचते रहे.''अब तुम देखना ,मैं उनके बच्चे के साथ क्या सुलूक करती हूँ.बस एक बार इसे जन्म लेने दो, मैं इसके जिस्म का एक-एक रेशा अपने नाखूनों से अलग करुँगी.बस इसे जन्म लेने दो'' वो बोले जारही थी ,यूँ जैसे अपने आप में ना हो.
डा. सेन ने ऐसी खतरनाक सिच्वेशन का तसव्वर भी नही किया था.
उन्होंने अस्पताल के दूसरे डॉक्टरों से मशविरा किया.सभी इस दर्दनाक सूरत--हाल के आगे बेबस थे.
अंत में सब की राय यही थी कि सीज़र के ज़रिये delivery कराई जाए और बच्चे को माँ से हमेशा के लिए दूर कर दिया जाए.
आखिरकार ये सब्र आजमा वक़्त गुज़रा और ओपरेशन से लड़की ने एक स्वस्थ बच्चे को जन्म दिया.
असली मुश्किल तब आई जब लड़की को होश आया.उसने चीख-चीख कर आसमान सर पर उठा लिया.उसकी एक ही रट थी कि बच्चा उसे दिया जाए वरना वो अपनी जान ले लेगी.
डा.सेन अपनी पेशेवराना जिंदगी में इतने नर्वस कभी नही थे.
उसकी हालत के पेशे नज़र उसकी जान को पूरा खतरा था. लेकिन एक मासूम बच्चे को,उसके खतरनाक इरादों को जानने के बाद भी उसे सौंपना किसी भी लिहाज़ से ग़लत था.
अजीब सिच्वेशन थी. सब के हाथ पाँव फूले हुए थे. कई डॉक्टर ने राय दी कि उसे बच्चे के मुर्दा पैदा होने की ख़बर दी जाय.लेकिन डा.सेन जानते थे कि वो लड़की इस बात पर बिल्कुल भी यकीन नही करेगी.
और तब ---------
उन्होंने अपनी पेशेवराना ज़िंदगी का सब से बड़ा रिस्क ले लिया.
बकौल डा. सेन --- '' हाँ ,मैंने एक मासूम बच्चे की ज़िंदगी का रिस्क लिया क्योंकि मुझे तब भी माँ की ममता पर पूरा यकीन था.
'' मैंने ख़ुद अपने हाथों से उस बच्चे को उस वहशी माँ के हाथों में दिया.
उस ने जिस वहशत नाक अंदाज़ में बच्चे को झपट कर मुझ से छीना था, एक लम्हे के लिए मैं अन्दर तक लरज़ कर रह गया.
लेकिन मैंने देखा कि बच्चे को गोद में लेते ही उसकी वहशत साबुन के झाग की तरह बैठती चली गई.
वो पत्थर की मूरत की तरह देर तक रोते हुए बच्चे को देखती रही.
हम सब की तो जैसे साँसें रुकी हुयी थी.
फिर एक हैरत नाक मंज़र मेरे सामने था.
पत्थर की मूरत में हरकत हुयी थी.और फिर बेतहाशा उसने अपने बच्चे को चूमना शुरू कर दिया.
वो रोती जारही थी और उसे चूमती जारही थी.
साथ साथ कहे जारही थी.''तू मेरा बच्चा है,तू मेरे जिस्म का टुकडा है, तू सिर्फ़ मेरा है''.
इस दर्दनाक मंज़र ने मेरे साथ साथ सब को रुला दिया था.

बाबा से ये सब बताते हुए भी मैंने आख़िर में उन्हें अपनी आँखें साफ करते हुए देखा था.

कितनी देर तक तो मैं अपनी जगह से हिल भी नही पायी.
मैं रो रही थी या नही,मुझे याद नही है.
वाकई, माँ की ममता के आगे खुदाई भी झुक सकती है.माँ बनना एक ओरत के लिए दुनिया का सब से खूबसूरत अहसास है लेकिन क्या खुदा ने ममता का जज्बा देकर ओरत को और कमज़ोर नही कर दिया?
क्यों, वो किसी जज्बे के आगे इस कदर बेबस हो जाती है?
क्या उसके इसी जज्बे का फायेदा मर्दों ने उसकी कमजोरी समझ कर बार बार नही उठाया है?

23 comments:

भुवनेश शर्मा said...

सहमत हूं आपसे.

राज भाटिय़ा said...

आप दुवारा लिखी कहानी पढी बहुत हू मार्मिक लगी, सच मे रोंगटे खडे करने वाली हे ओर उस लडकी पर कया बीती हो गई, जब की हम पढ कर ही डर गये,
लेकिन आप सभी मर्दॊ को एक सा क्यो समझती हे, उस के पिता, भाई भी तो मर्द थे? सभी लोग एक जेसे नही होते, मर्दॊ मे ओर ओरतो मे अच्छे बुरे सभी मिलते हे,ओर हमारे समाज मे(हिन्दु, मुस्लिम ओर सिख) ओरत का दर्जा बहुत पबित्र ओर ऊचा हे,बेटी, बहिन,ओर मां के रुप मे, जब की युरोप मे ओरत को एक खिलोना समझा जाता हे, एक ओरत अपने को आजाद समझती हे, लेकिन जब उसे मह्सुस होता हे कि वह इस आजादी के भ्रम मे क्या कुछ खो बेठी तब तक देर हो चुकी होती हे,ना ही उसे पति नाम का प्राणी मिलता हे ना ही बच्चे,
हमारी यहां ओरत को घर की इज्जत समझा जाता हे, जिस के लिये वाप,भाई, पति ओर बेटा पहले अपनी जान देता हे, इस लिये कुछ अपवाद को छोड कर बाकी समाज के साथ चलो, एक दो की बेवकुफ़ी से अपने पुरे समाज के मर्दॊ को गलत देखना कहा की समझ दारी होगी,बिना मर्द के भी दुनिया अधुरी हे ओर बिना ओरत के भी दुनिया अधुरी हे,
ओर जो दरिंदे हे ऎसे घिन्नोने काम करते हे उन्हे सजा देना भी इसी समाज का हक हे, ओर समाज मर्द ओर ओरत से मिल कर बना हे

Sanjeet Tripathi said...

सहमत!

आपको इस बात के लिए शुक्रिया कहना चाहूंगा कि आप उर्दू के शब्द लिखती हैं तो साथ में उनके अर्थ भी दे देती हैं। शायद उर्दू सीखने का इससे बेहतर तरीका नही मिलेगा हमें कि शब्दों के अर्थ और उनका व्यवहार मे प्रयोग एक साथ पढ़ने को मिले!

शुक्रिया!

Manish said...

बड़ा मार्मिक वाकया था। फ़ायदा उठाने की बात भी सही है आपकी।

munish said...

i agree with manish and support u wholeheartedly.u seem quite mature unlike ur pics.

munish said...

have u got an invite from chokherbali? i think that blog is doing a great service for d feminist cause .

SUNIL DOGRA जालि‍म said...

कमजोर..???????????

इतना ताकतवर बना दिया है खुदा ने कि मर्द आज औरत के सामने खडे होने के लायक भी नहीं रहे इस पोस्ट को पढने के बाद तो बिलकुल भी नहीं....

विजयशंकर चतुर्वेदी said...

आपकी भाषा का मैं कायल हूँ. आज की पोस्ट पढ़कर तो मैं दंग रह गया.
'बेटियों का ब्लॉग' में मेरी एक कविता चढाई गयी है पिछले दिनों- 'बेटी हमारी'. देख कर बताइये कि आपकी शिकायत कुछ दूर हुई या नहीं. दुनिया में सब इंसान एक जैसे नहीं होते.
ब्लॉग का यूआरएल है- daughtersclub.blogspot.com

Udan Tashtari said...

बहुत उम्दा और मार्मिक वृतांत है.सहमत हूँ के सिवाय कुछ कहना नहीं चाहता. लेखनी में धार है.
बधाई.

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आपकी नई फोटो लग गई. :) पुरानी आर्काईव में रखते जाईये ताकि मालूम चले कि फिर से न लग जाये. हा हा!

Lavanyam - Antarman said...

रसकाँधा जी,
ऐसा वाकया मैँने भी सुना है !
डा. सेन वाकई अच्छे मनोविशेशज्ञ हैँ ये तो पक्की बात !
लिखती रहीये ...
-लावण्या

कुश एक खूबसूरत ख्याल said...

bhatiya sahab se sehmat hu... filhal to kuch kehne ki stithi mein nahi hu.. magar andar tak utar gaya ye lekh.. aapki lekahn shaili waqai uttam hai..

lovely kumari said...

aapne "mukhtaran mayi" ke bare me to suna hoga aapki is post se unki yad taja ho gyi.

mehek said...

ma ki mamta par sara jag hara,sundar lekh.

pramod kumar kush 'tanha' said...

aapki lekhi mein nayee baat hai. aapko badhayee...

अभिषेक ओझा said...

इस पोस्ट को पढने के बाद कुछ कहने की हालत में नहीं हूँ, शायद माँ की ममता दरिंदगी के पीछे छुप गई... !
इस पोस्ट में गलतियाँ क्या निकालूँ मैं?, शाब्दिक गलतियाँ कोई मायने नहीं रखती इतने मार्मिक लेखन में, बस ओरत को औरत कर दें .
उर्दू शब्द समझाने में दिक्कत होती है... अर्थ देने के लिए धन्यवाद.

rohitler said...

खूबसूरत... बेहद खूबसूरत लेख

rakhshanda said...

@भाटिया जी,मैं आपकी इस बात से सहमत हूँ कि सारे मर्द एक जैसे नही होते और उस लड़की के भाई और पिता भी मर्द ही थे ,मैं नही जानती कि वो कैसे थे,बहन के साथ उनकी संवेदना तो उनकी मजबूरी भी कही जासकती है,लेकिन ख़ुद डा.सेन भी पुरूष हैं,आपकी इस बात में भी सच्चाई है कि हमारे यहाँ ओरत की इज्ज़त पश्चिम की तुलना में कुछ मायनों में ज़्यादा की जाती है लेकिन कहीं कहीं हम उन से नीचे भी गिर जाते हैं,सच पूछिए तो सर,सवाल यही उठता है ये दरिंदगी सिर्फ़ पुरूष ही क्यों दिखाता है? क्या आपने कभी सुना है कि कुछ ओरतों ने किसी लड़के का ऐसा हाल बना दिया हो?
सवाल अजीब सा है और हो सकता है आप ये सोचें कि एक लड़की हो कर मैं कैसी बातें कर रही हूँ,,लेकिन ये भूलकर कि मैं कौन हूँ और मेरी आयु क्या है,कृपया मुझे बताएं कि जब ऐसी घटनाएं अपनी ही जैसी लड़कियों के साथ होती है तो क्या सारी दुनिया,सारे समाज और सारे पुरूष जाति से नफरत सी नही हो जाती?
कभी कभी ख़याल यहाँ तक आता है कि ओरत को कमज़ोर और शारीरिक रूप से बेबस बना कर ख़ुद खुदा ने कोई साजिश तो नही की ?
मेरी भाषा में अगर कहीं कोई बात आपको बुरी लगी हो तो मैं माफ़ी चाहती हूँ,मेरा मकसद आपको हर्ट करना नही है,बस कुछ उलझन है जिन्होंने नींदें तक छीन ली हैं,,हो सके तो उन्हें सुलझा दें.

rakhshanda said...

भुवनेश जी,राज जी ,संजीत जी,मनीष जी,मुनीश जी ,सुनील,विजयशंकर चतुर्वेदी जी,समीर जी (उड़न तश्तरी) लावण्या जी ,कुश,लोवेली ,महक जी ,प्रमोद जी,रोहित्लर और अभिषेक आप सभी का बहुत बहुत शुक्रिया इस दर्द को अपने साथ बांटने के लिए,thank u so much

DR.ANURAG ARYA said...

माँ माँ ही रहेगी ...जिंदगी ऐसी ही है ..रोज एक नया तजुर्बा आपको सिखलाएगी ....ओर मैंने अपनी आंखो से उन मायो को देखा है जो अपना इलाज इसलिए जारी नही रखती ताकि उनके बच्चे का इलाज जारी रहे ....आपकी कथा मर्मस्पर्शी थी.....

pallavi trivedi said...

बहुत ह्रदय स्पर्शी लेख है....माँ शब्द के आगे तो दुनिया की हर चीज़ बेमानी है !भाषा बहुत प्रभावी है आपकी.

pearl neelima said...

yes , but this is the strongest trait of women...

munish said...

jo bhi kaho Rakshoo , comments ke maamle mein tum avval ho!! ho hi bass!

रवीन्द्र रंजन said...

वाकई में रोंगटे खड़े हो गए इस वाक्ये को पढ़कर।