Thursday, May 29, 2008

They are daughters ...... not your property...बेटियाँ हैं...जायदाद नही...


कहते हैं खून के रिश्ते आख़िर खून के रिश्ते होते हैं, लाख रंजिश हो, एक को तकलीफ में देख कर दूसरा तड़प उठता है, लेकिन लगता है ये सारी बातें , सारे दावे बदलते वक़्त के साथ साथ अपनी हैसियत बुरी तरह खोते जारहे हैं. आज सारे रिश्ते अपनी पाकीज़गी तो खो ही रहे हैं, ऐसा लगता है जैसे अपना वजूद भी खोते जा रहे हैं. हर दिन हम किसी किसी रिश्ते को दम तोड़ता हुआ देखने पर मजबूर हैं.

कल हल्द्वानी में हुयी एक घटना एक अजीब सी सोच को जन्म दे कर चली गई.
वाकया कुछ यूँ ही कि मुन्ना मंसूरी नाम के आदमी की बेटी रेशमा ने साल भर पहले अपने पड़ोस में रहने वाले लड़के से प्रेम विवाह किया था . लड़की के घर वाले इस रिश्ते के ख़िलाफ़ थे. बहरहाल दोनों हँसी खुशी जिंदगी गुजार रहे थे. रेशमा गर्भवती थी. बुधवार की शाम दोनों बाज़ार से खरीदारी कर के कार से लौट रहे थे. रास्ते में रेशमा के भाईयों ने उन पर धारदार हथियारों से हमला कर दोनों को बुरी तरह लहुलुहान कर दिया. लोगों ने जैसे तैसे दोनों को अस्पताल पहुंचाया, जहाँ देर रात , पहले रेशमा के साथ उसके पेट में आठ महीने के बच्चे , और थोडी देर बाद उसके पति की भी मौत हो गई.

इंसानियत और रिश्तों को शर्मसार करने वाली इस घटना से लोग भड़क उठे और उन्होंने रेशमा के भाइयों को पकड़ कर खूब पीटा और उनके घर को आग के हवाले कर दिया.

ये कोई अनोखी घटना नही है, ऐसी या इस से मिलती जुलती घटनाएं रोजाना हमारे अखबारों का हिस्सा बनती रहती हैं. हम सुबह की चाय के साथ इन्हें पढ़ते हैं और भूल जाते हैं. आरूशी हत्याकांड जैसी कुछ हाई प्रोफाइल घटनाएं ज़रूर लोगों की दिलचस्पी का कारण बनती हैं क्योंकि मीडिया दिन रात इनको हाई लाईट करता है.

लेकिन बहुत कम लोग हैं जो ये सोचते हैं कि आख़िर ऐसी घटनाओं का कारण क्या है?

रिश्ते कहाँ खोते जारहे हैं?

ज़रा ध्यान से ऐसी घटनाओं पर गौर करें तो एक सीधी साफ वजह समझ में आती है. वजह है बेटियाँ….

ऐसे सारे मामलों में आम तौर पर यही देखा गया है कि लड़की के घर वाले बेटी के साथ दामाद या उसके प्रेमी को मौत के घाट उतार देते हैं. कारण साफ है कि बेटी की दिखायी हिम्मत उन्हें रास नही आती और वो इसको अपने स्वाभिमान का मसला बना लेते हैं और इस कदर बना लेते हैं कि उसके आगे ना उन्हें रिश्ते दिखायी देते हैं उसके बाद होने वाली क़यामत का अहसास होता है.

ये स्वाभिमान सिर्फ़ बेटी की हिम्मत पर क्यों?

लड़के भी अपनी मरजी से शादी करते हैं. कई बार जात बिरादरी, यहाँ तक कि अपने धर्म से अलग लड़की से करते हैं. लड़के के घर वाले बड़े आराम से उन्हें माफ़ कर देते हैं लेकिन यही काम जब एक लड़की करती है तो सज़ा ही हक़दार क्यों ठहराई जाती है?

इस दोहरे मापदंड की वजह सदियों से बेटी को अपनी जायदाद समझने की मानसिकता रही है.

आज भी हम बेटी बहुओं को अपनी प्रापर्टी समझते हैं.

हमारी जायदाद सिर्फ़ हमारी है, जब इस जायदाद को किसी और को ले उड़ता देखते हें तो हमारा खून खौल उठता है और हम हर अंजाम को भूल कर मरने मारने पर तुल जाते हैं.

आख़िर ऐसा कब तक होता रहेगा?

हम क्यों नही समझते कि हमारी बेटियाँ भी इंसान हैं, उनके भी जज्बात हो सकते हैं, उन की भी कोई मरजी , पसंद ना पसंद हो सकती है.

ठीक है कि माँ बाप दुनिया को उन से ज़्यादा समझते है. ग़लत बातों पर उन्हें प्यार से समझया जासकता है. उंच नीच बताई जासकती है. लेकिन जब वो अपनी मरजी कर ही लें तो उन्हें उनकी जिंदगी का जिम्मेदार समझ कर हँसी खुशी रहने क्यों नही दिया जाता?

बीच में ये स्वाभिमान का मसला कहाँ से आजाता है?

जब तक हम बेटे और बेटियों को समान अधिकार नही देंगे, सवाभिमान कि ये आग ऐसे ही खूनी ताण्डव कराती रहेगी.

14 comments:

कुश एक खूबसूरत ख्याल said...

आंशिक सहमत हू आपसे.. वैसे बहुत संजीदा सोच है आपकी.. जो की क़ाबिले तारीफ है..

अभिषेक ओझा said...

बात तो ठीक है लेकिन सब एक जैसे नहीं होते... और ये कुछ अपवाद जैसे किस्से हैं, मानसिकता कुंठित कुछ लोगों की ही होती है... इसलिए इसे सब पर generalize करना सही नहीं है...

रंजू ranju said...

यह मुद्दा तभी सुलझ सकता है जब तक हमारी सोच इस दिशा में विकसित नही होती की अब बेटी और बेटे में कोई फर्क नही है .पर अभी इस में वक्त लगेगा ..बहुत जगह अब हालात बदल चुके हैं ..पर अभी भी कई इलाके भारत के हैं जहाँ अभी यह फर्क बहुत किया जाता है ..शिक्षा का प्रसार जितना अधिक होगा हर दिशा में सुधार होगा ..

DR.ANURAG ARYA said...

रंजना जी ने दुरस्त फरमाया है .....दो ही दुश्मन है इस समाज के .....गरीबी ओर अशिक्षा ....फ़िर भी अगली पीड़ी से कुछ उमीदे है......

Sandeep Singh said...

परिवार अहम की तुष्टि के लिए सारा कुछ पुरुषों के ही हित में करता है इस बात के लिए कम से कम अब सहमत नहीं हुआ जा सकता। हां अनुपात कम ज्य़ादा का हो सकता है। मेरठ के पास किसी एक इलाके की एक खबर जिसे कुछ न्यूज चैनलों ने भी दिखाया था....व्यभिचारी भाई की पिता ने सुपारी किलर के हाथों हत्या करा कर बेटियों को निजात दिलाई थी। हां आपकी संवेदनशीलता पाठक को भी भावुक कर देती (भले ही कुछ समय के लिए)लेख की सार्थकता शायद इससे बड़ी कुछ हो भी नहीं सकती।

Krishan lal "krishan" said...

rakshanda ji
aapke is savendansheel lekh se prabhavit huye bina nahi raha ja sakta. Rishton kaa tutna bikhrna ek chinta ka vishay hai. Aapne is aur dhyaan kheenchaa hai achhii baat hai.
Prantu aap ki is baat se sahmat nahi huya jaa sakta ki betiyo aur bahu ko log property samajhte hain is liye ye sab ho raha hai. Baat uye hai hii nahi. baat itni si hai jab jab shikshaa badhti hai aadmi self centered jyaada ho jata hai, rishte tutane lagte hai jis kaa prabahaav sab riston par padta hai chahe vo beta ho ya beti pati ho ya patni maa ho yaa baap. ye badhte divorce, ye roz khulte old age home, kahan jaa rahe hai hum. Aap ise jab tak sirf aurat ke sandarbh me ise dekhengi ye samsyaa nahi hal hogi. ise wider perspective chaahiye.

Udan Tashtari said...

आप का आलेख भावुक कर देने वाला है. मुझे लगता है कि तेजी से बदलाव आ रहा है. स्थितियाँ सुधर रही हैं. आने वाली पीढ़ी से बेहतर आशायें जागी हैं. शिक्षा के प्रति भी लोगों में जागरुकता का संचार हुआ है. निश्चित ही यह घटना महज अपवाद नहीं है किन्तु इस तरह की घटनाओं में निरंतर कमी आई है. भविष्य को लेकर काफी आशांवित हूँ.

आपका चिन्तन जायज एवं सार्थक है.

bavaal said...

Priy rakshanda jee,
bahut sanjeeda baat hai. Hum apse poorntah samat hain jee. Ajee mohabbat ke sipahee hum lal-n-bavaal.blogspot.com hain. Dekhte hain kaun betiyon ko maar paata hai. Aaap ek khoobsoorat zahan rakhtee hain aur pesh karne ka tareeka adeebon se badhkar hai.Maalik aap aise logon ko lajawaal kare.

दिवाकर प्रताप सिंह said...

सहमत हूँ आपसे, बेटी...बेटी होती है .........जायदाद नहीं !

munish said...

र ..र..र..क्षू जज ज ...जी ! प ...प ...पा... नी! पानी!..पानी !just wanted to bypass without commenting but juss had a glance at ur new pic.!

mehek said...

bikkul sehmat hai aapse hum bhi rakshanda ji,aaj bhi aisi ghatana hoti dekh hairat hoti hai,magar ye bhi badlga,jab shiksha ka prasar jyada hoga.

pallavi trivedi said...

sach kahti ho...haanlaki haalat badal rahe hain par eqality aane mein abhi bahut time lagega.

Manish said...

बहुत सही मसले को उठाया है आपने..
मैं सिर्फ इतना कहना चाहूँगा कि अशिक्षा और गरीबी के आलावा बचपन से कुछ ऍसे संस्कार समाज हम पर डालता है जिससे हर एक वर्ग की अलग पहचान बनी रहे। समाज के बड़े बूढ़े भी इसीलिए अन्तरजातीय और अन्तरधार्मिक विवाहों को तरज़ीह नहीं देते। जब भी ऍसी कोई ऍसी घटना होती है तो इंसानियत के सारे तकाजों को छोड़ लोग अपने स्वाभिमान अपने अहम को संतुष्ट करने के लिए ऍसे घृणित कर डालते हैं।
कलकत्ता के रिज़वान का मामला तो आपको याद ही होगा। वहाँ तो शिक्षा और गरीबी मसला नहीं थी।

sanjay patel said...

रक्षंदा..बात सौं फ़ी सदी सही है.एक बेटी का बाप होने की वजह से इस तरह की असुरक्षा मेरे मन भी रह्ती है लेकिन अब इंसान की सोच बदल रही है और ज़मान भी.जिस आत्मविश्वास के साथ बेटियाँ आगे बढ़ रही हैं उस लिहाज़ से तस्वीर बहुत जल्द बदलने वाली है. औरत की ताक़त का अंदाज़ ज़रा देर से ही सही ..हो ज़रूर रहा है और उसी लिहाज़ से बेटियों के प्रति नज़रिया भी बदलेगा नहीं बदलना शुरू हो गया है. हाँ एक बात और कहना चाहूँगा कि ब्लॉगर बिरादरी को चाहिये कि बेटियों,बहुओं और कामकाजी महिलाओं की तकलीफ़ों को रेखांकित तो करें ही लेकिन जहाँ भी ख़वातीन के करिश्मों के उजले कलेवर नज़र आएँ उन्हें भी बाँटे,इससे समाज को प्रेरणा मिलती है और यह संदेश भी जाता है कि कुछ लोग हैं जो हमारी बेटियों के साथ अपनी सोच बदल रहे हैं और उस बदलाव से बेटियाँ और बहुएँ बहुत ख़ुश हैं...बात ख़त्म करते करते एक उदाहरण देना चाहूँगा.मेरे एक बहुत नज़दीकी मित्र ने बेटे को अपनी पसंद की जीवन साथी चुनने दी है और बेटी को भी..तीनो परिवार बहुत सामंज्यस और सर उठा कर ज़िन्दगी जी रहे हैं किसी तरह की कोई ग्लानि का भाव नहीं है.एक साझा निर्णय के तहत सब ख़ुश हैं.मित्र अग्रवाल हैं बहू खंडेलवाल और दामाद जैन.देखिये हैं न एक उजला कलेवर ये भी.