Monday, August 18, 2008

इस हसीं रात के दामन में....


शायद ही कोई ऐसा होगा जिसने कभी शब-ऐ-बारात का नाम नहीं सुना होगा, इसकी वजह इसे बातचीत में इस्तेमाल होने वाले फिकरों में अकसर इस्तेमाल किया जाना रहा है. खुशियों भरे दिनों में अक्सर ये मिसाल दी जाती है, कि आजकल उनके दिन ईद और रातें शब-ऐ-बारात जैसी गुज़र रही हैं. लेकिन बड़े अफ़सोस कि बात है कि इतने ख़ास दिन को अगर किसी हिंदू या सिख भाइयों पूछा जाए कि इसके मनाने की वजह क्या है या ये त्यौहार कैसे मनाया जाता है तो शायद ही कोई बता सके, हम एक ही मुल्क में रहते हैं, हम देखने में एक जैसे हैं, हमारे रात और दिन एक दुसरे की संगत में गुज़रते हैं लेकिन हम एक दुसरे की रीत रिवाजों से पूरी तरह नावाकिफ हैं. 
मुस्लिम्स तो फिर भी हिन्दू रीत रिवाजों के बारे में थोडा बहुत जानते हैं, शायाद इसकी वजह भी ये रही हो कि उन्हें इसके बारे में जनवाया जाता है.लेकिन मुस्लिम्स के त्योहारों के बारे में जानने की वो कोशिश भी नहीं करते, इस कि एक बड़ी अफसोसनाक मिसाल मेरे साथ खुद पेश आई.
हुआ यूं कि एक बार कालेज में मेरी एक करीबी दोस्त ने मुझे मुहर्रम की मुबारकबाद दी. कितने दुःख की बात है कि मुहर्रम उनकी याद में मनाया जाता है जिन पर ग़मों का ऐसा पहाड़ टूट पड़ा था जो शायद नहीं यकीनन तारीख में कभी सुनने को नहीं मिला. ये वो मौका है जब सारे शिया मुस्लिम्स इमाम हुसैन और उनके परिवार की शहादत की याद में पूरे सवा दो महीने सिर्फ गम मनाते हैं.
ऐसे मौके पर मेरी दोस्त का हैप्पी मुहर्रम कहना किसी थप्पड़ मारने जैसा लगा था. जब मैंने उसे समझाया और इसके बारे में बताया तो उसे बहुत अफ़सोस हुआ और उस से ज़यादा अफ़सोस इस बात का हुआ कि एक ही देश में रहते हुए हम एक दुसरे से इस कदर नावाकिफ हैं. 
खैर शब-ऐ-बारात बहुत ही ख़ास दिन है. जो परसों मनाया गया. 
ये इमाम-ऐ-ज़माना (12th इमाम) हजरत मेहदी आखिर-उज़-जमां अलाहिस्सलाम की पैदाइश का मुबारक दिन है. जो निहाइत ख़ुशी का दिन है. 
इस मौके को दीवाली की तरह मनाते हैं. वैसे ही घरों को मोम बत्तियों से सजाया जाता है. पटाखे आतश बाज़िओं से माहौल चरागाँ सा हो जाता है. कई तरह के पकवान बनाए जाते हैं. जिन में तीन चार तरह के हलवे, जैसे चने कि दाल का हलवा, सूजी का हलवा, मैदे और मूंग दाल का हलवा, पूरी पराठे, चिकन पुलाव खीर बनायीं जाती है. फिर नज़र दिया जाता है. 
इस रात सारी रात इबादत कर के गुजारी जाती है.ऐसा माना जाता है कि इस रात हमारे बुजुर्गों(सवर्गीय) की रूहें भी अपने अपने घरों में आती हैं. इसलिए सारी रात रौशनी की जाती है.ठीक १२ बजे यानी इमाम की पैदाइश के वक्त लोग अरीज़े डालने जाते हैं. अरीज़े का मतलब अपनी कोई ख्वाहिश (इच्छा) लिख कर पर्ची पानी में डाली जाती है. फिर वापस आकर इबादत की जाती है और दुआएं मांगी जाती हैं. अपने, अपने रिश्तेदारों, दोस्तों अपने देश के लोगों के लिए, मुल्क का अमान-ओ-अमान के लिए. 
इस तरह एक बहुत ही हसीन रात अपनी दिलकशी के साथ ख़त्म होती है. 
यही है शब-ऐ-बारात. हमारे बारहवें इमाम की पैदाइश का यादगार दिन. 

(ऐ इमाम-ऐ-ज़माना मेरे मुल्क के लोगों को हर आफत और मुसीबत से दूर रखियेगा. इस मुल्क में सुकून और खुशियाँ हों, तरक्की के साथ साथ मेरे देश के लोगों को बे राह रवी और बुराइयों से दूर रखियेगा(आमीन)

30 comments:

Lovely kumari said...

hum waise bhi nawakifon ki jamat me shamil nahi hain mohtarama...

aur aapka yah iljam ki muslimo ko janwaya jata hai,sarasar galat hai.baki ispar kabhi pura post likhkar batungi.hamare yahan aisa nahi hota.

संजय बेंगाणी said...

अब मेरा दर्द भी सुन ले. ऐसा नहीं है की मुसलमानो से पाला नहीं पड़ता, आसपास काम करने वालो से लेकर मित्र तक मुसलिम है. मगर जब भी बात मजहब सम्बन्धि जानकारी या जिज्ञासा की आती है, पढ़े से पढ़ालिखा भी अजिब सा सतर्क हो जाता है, अरे भाई जानकारी पाने की जिज्ञासा का अर्थ यह नहीं की आपके मजहब पर कोई हमला कर देगा...बाद में पूछना ही छोड़ दिया.

बालकिशन said...

आप ने सही कहा है कि एक देश में रहते हुए हमें कम से कम एक दुसरे के बारे में इतनी जानकारिया तो जरुर रहनी चाहिए.
इस जानकारी पूर्ण लेख के लिए आपका आभार.

संजय बेंगाणी said...

हाँ कुछ कुछ आपने जो कहा है, वही मैने यहाँ लिखा था:


http://www.tarakash.com/joglikhi/?p=222

रंजना [रंजू भाटिया] said...

इतनी अच्छी जानकारी नही हैं इस बारे में आपने सही कहा ..कि हम बहुत कम जानते हैं इन त्योहारों के बारे में ..अब जान लिया है आपके इस लेख से .,और भी जानकारी देती रहे ..शायद यूँ जान जाए हम भी अपने ही देश में इन त्योहारों के बारे में भी ..बहुत रोचक लगा मुझे इसको जानना ..

अनुराग said...

कॉलेज में दो मुस्लिम लड़किया करीबी दोस्त थी ओर एक मुस्लिम लड़का भी ...ओर मंज़ूर एहतेशाम मेरे पसंदीदा लेखको में से एक ....इसलिए ज्यादा कुछ दिक्कत नही आयी ...पर आपकी राय ठीक है .. एक दूसरे के त्योहारों को दोनों पक्षों का समझना चाहिए

कुश एक खूबसूरत ख्याल said...
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कुश एक खूबसूरत ख्याल said...

माफ़ कीजिएगा रक्षंदा मगर मैं इस बात से सहमत नही हू की 'मुस्लिमो को हिन्दुओ के त्योहारो के बारे में जनवाया जाता है. और हिंदू मुस्लिमस के त्योहार जानने की कोशिश नही करते' इसे पढ़कर ऐसा लगता है की मुस्लिमस भी जानने की कोशिश नही करते बल्कि उन्हे ज़बरदस्ती जनवाया जाता है... और रही बात जानने या ना जानने की तो मुझे तो ये भी नही पता की गुड फ्राइडे,बैशाखी, ओनम क्यो मनाया जाता है.. लेकिन इसके लिए किसी को दोष देना ठीक नही..

मैने बस यही तक पढ़ा इसलिए इतना ही कमेंट किया.. आगे पढ़ने की इच्छा नही हुई.. उमीद है इस कमेंट को आप नेगेटिव सेंस में नही लेंगी..

Anil Pusadkar said...

mera bapan muslim bahul mohalle me guzra,adhikansh dost muslim the fir bhiitna detail me nahi jaanta tha,han ye zaruz malum hai ki ye khushi ka tyohar hai aur moharram gum ka,humare pados me bhi ek muslim parivaar tha,magar wo humare parivaar jaisa hi lagta tha.han ye bat jarur hai ki jaankari ka abhav kabhi-kabhi khatakta hai.magar isme bura manne waali baat nahi hai.sawaal aastha aur vishwaas ka hai,jante hue mai apmaan karun aur na jaante hue samman.aap hi bataite kya achha hai

महामंत्री-तस्लीम said...

यह आपका बडप्पन है जो आपने इतना कुछ लिखा। ऐसे बडे दिल वाले अब कम ही देखने में आते हैं।

राज भाटिय़ा said...

रक्षंदा,सब से पहले तो यह शब्द**जनवाया जाता है ** थोडा अपत्तिजनक लगा,क्यो कि हमारे यहां किसी को भी जवर्दस्ती धर्म का पाठ नही पढाया जाता, हमारे यहां जब भी हम कोई दिपावली, होली या कोई भी त्योहार मनाते हे तो अपने मुस्लिम भाईयो को जरुर बुलाते हे, कई हमारी पुजा मे भी हिस्सा लेते हे, कई बेठक मे बेठ जाते हे,ओर हमे भी अच्छा लगता हे कि हमारी खुशी मे हमारे मुस्लिम भाई आये.
ओर जब वह लोग अपना कोई त्योहार मनाते हे तो कभी भी नही बुलाते, मेने तो कई बार कह भी दिया भाई हमे भी कभी बुला लिया करो,ओर जब कोई हमे बुलायेगा ही नही तो हमे क्या पता चले गा उन के त्योहारो का,
धन्यवाद आप ने एक अच्छे विषय पर लेख लिखा

... said...

Kisi ek kaum ko doshi thaharana uchit nahi hai; kyonki yah sab vyaktigat ruchi ki baat hai. Aapke man men me bhi yah vichar nahi aana chahiye ki musalmano ko to janvaya jata hai aur hindu interest nahi rakhte muslim tyoharon men.

vipinkizindagi said...

बहुत अच्छी पोस्ट
उम्दा पोस्ट

Manish Kumar said...

aapne yahan par jo is tyohaar ke silsile mein jaankaari di uske liye shukriya.

Udan Tashtari said...

हिन्दुओं के घर में हिन्दु त्यौहार और मुसलमानों के घर उनके त्यौहार मनाते मनाते उन घरों के बच्चे अपने आप उन त्यौहारों के बारे में अधिक जान जाते हैं, इसमें तो कोई अचरज की बात नहीं.

एक ईसाई बच्चा ईसाई त्यौहारों के बारे में सब जानता है. बाकि दूसरे धर्म के त्यौहारों की जो किताब और मित्रों से जानकारी प्राप्त होती है, उतना काफी होता है जानना ताकि मुहर्रम की मुबारकबाद देने जैसी गल्ती न हो. उससे अधिक गहराई में जानना व्यक्ति विशेष की उत्सुक्ता पर निर्भर करता है, इसमें कैसी जोर जबरदस्ती.

आप यदि कुछ मुस्लिम फेस्टिवल्स के बारे में गहराई से जानकारी देंगी तो सभी पढ़ेगे उत्सुक्तावश और ज्ञान तो खैर बढ़ेगा है.

आशा करते हैं कि आप इस विषय पर अधिक लिखेंगी.

शुभकामनाऐं.

सतीश सक्सेना said...

आपने बहुत खुबसूरत प्रयास किया है रख्शंदा ! इस जज्बे और हिम्मत के लिए मेरी ओर से स्नेहयुक्त शुभकामनायें ! एक बहुत सही शिकायत के साथ, सुंदर पहल कर के बहुत अच्छा काम किया ! "जनवाया जाना" शब्द से कुछ साथियों को गलतफहमियां हुई हैं उसका स्पष्टीकरण आवश्यक है जो आपको देना चाहिए ! मेरा विचार है कि आपका अर्थ परिवार द्वारा जनवाया जाना है न कि किसी बाहर वाले के द्वारा, और ऐसा भारतीय समाज के परिवेश में,उचित भी था !
हम दो भाई साथ साथ रहने के बाद भी एक दूसरे के त्योहारों में शिरकत नही करते है यह एक कड़वी सच्चाई है, जो हमें स्वीकार करना होगी तथा हमें कटीवद्ध होकर इस तरह के प्रयास करने ही होंगे जिससे पारस्परिक स्नेह तथा खुलापन बढ़ सके ! शिक्षा और जानकारी सबसे अहम् रोल अदा कर सकती है, जिस खूबसूरती के साथ काबा की तस्वीर लगा कर उन्मुक्त भावः के साथ तुमने यह जानकारी दी है, वह तुम्हारी सदाशयता का प्रतीक है और मेरा विश्वास है कि तुम्हारे इस तरह के प्रयास जारी रहे तो तुम अवश्य कामयाब रहोगी मगर यह अत्यन्त आवश्यक है कि इस नाज़ुक विषय पर लेखन, हिम्मत, सही जानकारी एवं सावधानी के साथ ही लिखा जाए ! जिन साथियों ने जो सवाल उठाये है वे सभी अपने अपने क्षेत्र के सिद्धहस्त लोग हैं आप जवाब जरूर दे ! वे आपके साथ आयेंगे !

अनूप शुक्ल said...

बहुत अच्छा लेख। जानकारी में इजाफ़ा हुआ मेरी। लिखती रहें।

डा. अमर कुमार said...

.
कुछ कहना चाहूँगा, रख़्शंदा.. ..
मेरा एक एतराज़ दर्ज़ कर लो... ' जनवाया जाता है ' में
ज़बरई या ज़बरद्स्ती जैसा भाव है, क्या ऎसा ही है ?
नहीं.. यह केवल इस वज़ह से है, कि ये त्यौहार कम फुटकर
रोज़गार के मौके मुहैय्या कराता है, और ज़्यादातर कामगार
दुकानदार, कारीगर उस तबके से ताल्लुक रखते हैं, जो कि
बाद में मुस्लिम हो गये थे । सो यह जानकारियाँ उनके रोज़ी का
वायस है, चाहे वह बुनकर हो या आतिशबाज़.. या दीवारों पर
पुताई वाले... फ़ेहरिस्त लम्बी है

गौरतलब है, कि ऎसा पूरा मुस्लिम अमला शेख-सुन्नी तबके
से ही ताल्लुक रखता है.. पठान व शिया भी पुश्तैनी ज़ायदाद के
टुकड़े करते करते, अब इस मोड़ पर आ खड़े हुये हैं ।

Tarun said...

jaankaari barane ke liye achha lekh hai, baaki rahi tyohaaron ki baat to aap log bhi shayad wohi tyohar jaante honge jo common hain aur unhe manane ke liye desh me chutti hoti hai, you know public holiday. Aise hi hum bhi sirf wohi tyohar jante hain jinke liye chutti hoti hai jaise muharram, chrismas etc. Baaki janvaane ki jehan tak baat hai to shayad hume bhi apne hi kai tyohaaron ka pata nahi hoga kyon manaye jaate hain.

डा. अमर कुमार said...

.

कुछ कहना चाहूँगा, रख़्शंदा.. ..
मेरा एक एतराज़ दर्ज़ कर लो... ' जनवाया जाता है ' में ज़बरई या ज़बरद्स्ती जैसा भाव है, क्या सच ऎसा ही है ?
बिल्कुल नहीं.. यह केवल इस वज़ह से है, कि ये त्यौहार उन्हें फुटकर रोज़गार के मौके मुहैय्या कराता है, और ज़्यादातर कामगार, दुकानदार, कारीगर उस तबके से ताल्लुक रखते हैं, जो कि बाद में मुस्लिम हो गये थे । सो यह जानकारियाँ उनके रोज़ी का वायस है, चाहे वह बुनकर हो या आतिशबाज़.. या दीवारों पर पुताई वाले... या दर्ज़ी... फ़ेहरिस्त लम्बी है

गौरतलब है, कि ऎसा पूरा मुस्लिम अमला शेख-सुन्नी तबके से ही ताल्लुक रखता है.. पठान व शिया भी पुश्तैनी ज़ायदाद के टुकड़े करते करते, अब इस मोड़ पर आ खड़े हुये हैं ।

बात दीगर है, कि कोई हिंदू ईद की टोपियाँ या अनरसे बेचता हुआ.. कम से कम अपने शहर में तो नहीं ही दिखता..

सो, तुम्हारा यह ज़ुमला कहीं पर नामंज़ूर किये जाने के दर्द से हो, तो वह अलग की बात है । वरना यह तंग नज़रिये की तोहमत में शुमार किया जायेगा ।

अभिषेक ओझा said...

आज पूरी तरह असहमत हूँ आपसे. मैं नहीं मानता की जानकारी नहीं होती है. मेरे सबसे अच्छे दोस्त मुसलमान रहे हैं स्कूल से लेकर अब तक. और कभी धर्म की बात नहीं आई बीच में...

चर्चा खूब होती पर आदर भाव के साथ या कबीर दृष्टि से कभी एकतरफा नहीं !

rakhshanda said...

आप सभी का बेहद शुक्रिया जिन्होंने मुझे इतनी अच्छी तरह पढ़ा और अपनी बातें कहीं, यकीन मानिए मुझे आपके एतराज़ बुरे नही लगे, क्योंकि अगर ये एतराज़ नही किए जाते तो मुझे समझ में नही आता की मेरी कुछ बातों का क्या मतलब समझा गया, बस समझने में थोड़ा सा फर्क आया है जिसे कमेन्ट के रूप में लिखना चाहती थी लेकिन लगा की काफी डिटेल हो जाएगा, बात काफी महत्वपूर्ण थी इसलिए उसे पोस्ट के रूप में लिख रही हूँ, उम्मीद है, मैं अपनी बात ईमानदारी से लिख पायी हूँ. शुक्रिया.

rakhshanda said...

@राज जी, आपने लिखा की आप करीब आना चाहते हैं और आपने ऐसी कोशिश की लेकिन आपको बुलाया नही गया इसलिए आपने भी कोशिश छोड़ दी, अगर ऐसा हुआ है तो वाकई बड़े अफ़सोस की बात है, आपको पता है यहाँ देहरादून हमारा कोई रिश्तेदार नही है लेकिन त्योहारों पर इतने लोग आते हैं की शाम तक थकन से बुरा हाल हो जाता है, और उन में मुस्लिम्स दोस्त गिनती के होते हैं, जायदा तर हिंदू और सिख दोस्त ही होते हैं चाहे वो मेरे या मम्मी के हों या पापा के...लेकिन हो सकता है की ऐसे लोग भी हों, लेकिन ये बेहद ग़लत और शर्मनाक है.

rakhshanda said...

संजय जी, मुझ से कोई अपने त्योहारों के बारे में पूछे तो बेइंतहा खुशी होती है, कौन लोग ऐसे हैं जो बताते हुए डरते हैं, बहरहाल जो भी हैं उन्हें ये जानना चाहिए की एक दूसरे को जानकर ही हम आगे बढ़ सकते हैं, जब हम अपने ही लोगों को नही जानेंगे तो किसको जानेंगे?

rakhshanda said...

@सतीश सक्सेना जी-- सब से पहले बेहद शुक्रिया मुझे इतनी अच्छी तरह समझने के लिए, सच कहूँ तो जितनी अच्छी तरह आपने मुझे समझा है और मेरी बात और दोस्तों को समझाने की कोशिश की है, उसने मुझे बेहद मुतास्सिर किया है, शायद इतनी अच्छी तरह तो ख़ुद मैं भी अपनी बात नही रख पाती, आपने ठीक कहा की जो ग़लतफ़हमी मेरे एक जुमले से बाकि दोस्तों को हुयी है उसे मुझे अच्छी तरह दूर करना चाहिए, और सतीश जी, वाकई मेरे जुमले वो मतलब हरगिज़ नही था और आपका भुत शुक्रिया की आपने मुझे ऐसा मशवरा दिया. थैंक्स

rakhshanda said...

@अमरजी-- तन्ग्नज्री की तोहमत तो लगा दी अमरजी, अब ज़रा मेरी पोस्ट पढ़कर तफसील से बताएँगे की तंग नजरी कहाँ होती है?उम्मीद है आप बुरा माने बगैर मेरी बात का जवाब देंगे. थैंक्स

rakhshanda said...

@कुश- सच कहूँ तो सब से ज़्यादा दुःख मुझे कुश माफ़ कीजियेगा,कुश जी, के कमेन्ट ने दिया है, जिन्हें मेरा एक जुमला इतना बुरा लगा की बाकी पोस्ट पढने की उन्हें इच्छा ही नही हुयी, एक शायर वो भी इतने हस्सास शायर से ये उम्मीद हरगिज़ नही थी. कुश जी, ऐसा है तो आज के बाद तो आप मेरी दूसरी पोस्ट भी नही पढेंगे, क्या पता, उस में ऐसी कोई बात हो जो आपकी हस्सास तबियत को नागवार गुज़रे...बहरहाल आपका शुक्रिया और हाँ, मैंने आपके कमेन्ट को किसी नेगेटिव सेंस में नही लिया.

डा. अमर कुमार said...

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" मुस्लिम्स तो फिर भी हिन्दू रीत रिवाजों के बारे में थोडा बहुत जानते हैं, शायाद इसकी वजह भी ये रही हो कि उन्हें इसके बारे में जनवाया जाता है.लेकिन मुस्लिम्स के त्योहारों के बारे में जानने की वो कोशिश भी नहीं करते, "

बस.. बस, बस यहीं पर !
यदि कोई ज़ुमला ' फ़ैक्ट ' का दर्ज़ा रखे,
तो उसे ' फ़िक्शन ' की तरह मत देखो !
इसकी तहकीकात करके ही अपलोड होना चाहिये था !

फ़िरकापरस्त और फ़िरकेपरस्ती किस फ़िरके में नहीं हैं ?
लेकिन यदि हम और तुम बात कर रहे हों,
तो अपना नज़रिया भी तो रखा जाना चाहिये ..

नज़रिया न रखने देने का स्वामी-संहिता यदि यहाँ भी लागू हो, तो मैं अपना नज़रिया वापस अपनी ज़ेब में रख लेता हूँ, दरकार तो नहीं, पर माफ़ी न मिले,
तो भी चलेगा..
नज़रिया तो मेरा अपना ही रहा न !

राकेश जैन said...

ACHHA LEKH HAI, LEKIN THODA ADHIK LENGTHY HAI..

MUJHE PARVA KA MAHATVA AUR USKI PRASANGIKTA TO SAMAJH AA GAI, AUR IS BARE ME UTSUKTA BHI YUN HUI KI IS RAAT KO MAIN APNE GHAR SE INDORE KE LIE RAWANA HUA AUR JAB MADHYA RATRI ME BHOPAL PAHUNCHA TO LAGA JAISE SARA SHAHAR JAG RAHA HO, MUSLIM BHAIYON KI HAR JAGAH MAUZUDGI AUR BUS KE ROUTE ME HUE PARIVARTAN SE PATA CHALA KI AAJ BUS SEEDHE NA JA KAR KISI AUR MARG SE JAYEGI, KYUNKI SEEDHE RASTE PAR KABRISTAN HAIN JAHA AAJ MUSLIM BHAI APNE IS TYOHAR ME MASHROOF HAIN, JIGYASA HUI KI ESA KYA HAI IS TYOHAR ME KI LOG KABRISTAN ME CELEBRATE KARTE HAIN, MERI DASHA BHI APKA ARTICLE PARHNE SE PAHLE TAK BILKUL VAISII HI THI JAISI APKI FRIEND KI APKO MOHARRAM WISH KARTE SAMAY HOGI. MUJHE LAGA THA ZURUR IS KA KISI KI SHAHADAT SE VASTA HOGA TABHI ISKA TALLUK KABRISTAN SE HAI, MAGAR APNE AB CLEAR KIA KI VAJAH KYA HHAI, AUR YAH KIS TARAH KA PARVA HAI, MUJHE SHAB-E-BARAT KA SHABDIK ARTH JANNE KI BHI ICHCHA HAI...

Anonymous said...

aap ki baat poori tarah sahi nahi hai. kam-s-kam hindu kabhi bhi eid bakreed aadi mauke par muslim friends ke yaha jaana avoid nahi karte ki yeh paap hai par kai muslim holi ke rango se itna bachte ahi jaise rang nahi acid hai. unko kaha jata hai hi jiske badan par holi ka rang pad jayega vo dojakh (narak hell) me jayega. agar doosro ke baare me na jaanna galat hai to doosro ke baare me galat jaanna ya kahe GALAT JANVANA kya hai? aasha hai aap samajh rahi hai.