Tuesday, August 19, 2008

हम एक हैं,तो एक होने से डरते क्यों हैं?


अपने बारे में कहूँ तो दिल में आई सारी बातें ''अच्छी हों या बुरी'' हमेशा से सामने कह देने की आदी  रही हूँ. इस आदत ने मेरे कई दुश्मन भी बनाए हैं, लेकिन अकसर दोस्तों का यही कहना है कि उन्हें मेरी ये आदत पसंद है. ब्लोगिंग की दुनिया में आई तो भी वही हाल रहा, जहाँ जो बुरा लगा, लिख दिया, ये ख्याल नही आया कि इसे किस तरह चाशनी में डुबो कर लिखना है. शायद ये मेरी कमजोरी है.

इस बात का शुक्रिया अदा करुँगी कि आप सब ने मुझे पढ़ा और पूरी साफगोई से इस पर कमेन्ट दिए, ठीक उसी तरह बिना किसी लाग लपेट के,मुझे इस बात की खुशी है  लेकिन थोड़ा सा दुःख इस बात का है कि ठीक से समझने की कोशिश नही की गई,मेरे इस जुमले का '' उन्हें इसके बारे में जनवाया जाता है.'' का मतलब सही नही लगाया गया.

 ''जनवाया जाता है'' लिखने का मतलब ठीक वही था जो मैंने अब तक जाना है, शायद आपको नही मालूम कि मेरे बाबा बचपन में जब हम बच्चों को इमाम हुसैन अहिस्सलम पर हुए जुल्मों के वाकये सुनाते थे और ये बताते थे कि किस तरह उन्होंने अपनी और अपने परिवार और दोस्तों की शहादत तो कबूल कर ली लेकिन बुराई के आगे झुकना स्वीकार नही किया तब वो ये भी बताते थे कि अगर इमाम उस समय भारत आगये होते तो उनके साथ ऐसा नही हुआ होता, क्योंकि यहाँ के लोग उन्हें सर आंखों पर बिठाते, वो हमें अगर रसूल अ ह की बातें बताते थे तो राम चन्द्र जी की बातें भी सुनाते थे,मेरे बाबा हिंदू मज़हब में सब से ज़्यादा विष्णु जी से प्रभावित हैं और वो कहा करते हैं कि उन्होंने(विष्णु भगवान्) भी भविष्वाणी में कहा था कि धरती पर रसूल AH के रूप में आखरी नबी प्रकट होंगे...मैं इस बात का दावा नही करती कि इस बात में कितनी सच्चाई है और ये कि विष्णु भगवान् ने ऐसा कहा था या नही लेकिन इन बातों के लिखने का मतलब यही है कि हम ये सब जानते हुए बड़े हुए, ज़रा ईमानदारी से बताइयेगा, क्या आप में से किसी के बुजुर्गों ने रसूल और इमाम AH के बारे आपको सही जानकारी कभी देने की कोशिश की? जहाँ तक मुझे मालूम है ऐसा नही हुआ, मैं मानती हूँ कि ख़ुद मुस्लिम्स में भी ऐसा ही है, हमें ना ही सिखों के त्योहारों के बारे में पूरा इल्म है न ही हिंदू त्योहारों के बारे में लेकिन ऐसा नही होना चाहिए, हम एक देश यानी एक घर में रहते हैं, अगर हम ही एक दूसरे को नही जानेंगे और समझेंगे तो क्या कोई दूसरा देश आकर हमें समझेगा?
अब एक और बात, जिसे अगर मैं ना कहूँ तो बेईमानी होगी, मुझे इस बात का डर नही है कि आप में से किसी को मेरी बात का बुरा लगेगा, ''जनवाया जाना '' का ये मतलब बिल्कुल नही है कि कोई हमें ज़बरदस्ती जानने पर मजबूर करता है, हाँ ये ज़रूर है हम बहुत तरह से जान जाते हैं और सच पूछिए तो इस बात की खुशी होती है जब मेरी छोटी बहन आकर बताती है कि आज राखी कम्पटीशन है, जन्म अष्टमी के मौके पर हमें ड्राइंग फाइल में कृष्ण जी की तस्वीर बनानी होती थी तो हम उनके बारे में ध्यान से पढ़ते थे, उनके एक एक अंदाज़ पर गौर करते थे, दशहरा और दीवाली पर हमें निबंध लिखना होता था तो अलग अलग किताबों से ज़्यादा से ज़्यादा जानकारी हासिल करने की कोशिश रहती थी कि सब से अच्छा हम लिख सकें, संस्कृत में श्लोक कम्पटीशन होते थे तो इच्छा होती थी कि हम भी पार्ट ले सकें, और आप यकीन मानें या ना मानें इन सब बातों की हम बच्चों को खुशी ही होती थी, दीवाली में हम भी पटाखे ज़रूर ले कर आते हैं, कोलकाता में थी तो दुर्गा पूजा तो जैसे हमारा ही त्यौहार हुआ करता था, नए कपड़े ज़रूर खरीदने हैं, पूजा देखने जो जाना है, थोडी ज्वैलरी भी होनी चाहिए, उस दिन सारी लड़कियां सजती जो हैं और मेरे पापा हमारे ये शौक बड़ी खुशी खुशी पूरा करते थे, पूजा के दिन हम बड़े इह्तेमाम से बाहर निकलते थे, दुर्गा देवी के बारे में और ज़्यादा जानने का शौक होता था, लेकिन--खुशी हो, गम हो या गुस्सा...कभी एकतरफा नही होता, एक तरफा हो तो इंसान थक जाता है और फिर उसे कहीं ना कहीं अपने नज़र अंदाज़ किए जाने का अहसास ज़रूर होता है,
 अपने स्कूल की बात करूँ, बहन के करूँ या मेरी छोटे भांजे के स्कूल की, इन सारे त्योहारों में कभी हमें ईद के बारे में नही बताया गया, कभी मुहर्रम के बारे में जानकारी नही दी गई, दुःख तब और शिद्दत अख्तियार कर जाता है जब क्रिसमस को बड़े ही शानदार तरीके से मनाया जाता है, बच्चों से गिफ्ट मंगाए जाते हैं, हम में से ही कुछ बच्चे संता के वेश भूषा में बाकी बच्चों को चाकलेट्स और गिफ्ट बाँटते हैं स्कूल में पार्टी होती है और खूब मस्ती करवाई जाती है, जब मैं पढ़ती थी तब भी और आज भी ये सब वैसे जारी है, इसके स्वरूप में कहीं भी कोई बदलाव नही आया है, ज़रा बताइये, क्या ये सही है?
क्या इस तरह हमें अहसास नही दिलाया जाता कि हम अलग हैं?
क्या हमारे स्कूलों का ये फ़र्ज़ नही कि हमारे हिंदू और सिख बच्चों को बताया जाए कि मुहर्रम क्यों मनाया जाता है? रमजान और ईद का क्या मतलब है?
क्या कहीं कोई कम्पटीशन या किसी तरीके से दूसरे बच्चों को इन त्योहारों की खासियत नही बतानी चाहिए?
अगर ऐसा होता तो क्या कोई लड़की मुहर्रम जैसे गमगीन त्यौहार को 'हैप्पी मुहर्रम'' कह कर शर्मिंदा होती? और क्या मेरे जैसी लड़की अपने ही देश में रहने वाली अपनी दोस्त को अपने त्यौहार के बारे जानकारी यूँ देती जैसे वो किसी अजनबी देश आई है?
नही....आप बुरा बड़ी जल्दी मान जाते हैं, लेकिन सच्चाई को स्वीकार नही करते, अरे , हम करीब आना चाहते हैं, आप को अपने करीब लाना चाहते हैं लेकिन आप आने तो दें..हम जितना करीब आयेंगे,दूरिया उतनी ही मिटेंगी,ये त्यौहार दूरियां मिटाते हैं, एक दूसरे के करीब लाते हैं, और जब हम एक हैं तो एक होने से डरते क्यों हैं?

हमारा यही डर तीसरे लोगों को मौका देता है हमें एक दूसरे से अलग करने का, दोनों तरफ़ के सियासी लोग अपने अपने मुफाद के लिए इन दूरियों को और बढाते हैं.और हम इतने सादा हैं कि उनकी चाल को समझ ही नही पाते.



39 comments:

vijay gaur/विजय गौड़ said...

निश्चित ही बहुत अच्छे और सादगी से बातें कही गयीं हैं। अच्छा लगा पढना।

राजीव रंजन प्रसाद said...

आपके इस सारगर्भित आलेख की मैं मुक्त हृदय से प्रशंसा करना चाहता हूँ..


***राजीव रंजन प्रसाद

Lovely kumari said...

यार दूसरों का नही पता ,मैंने कभी ऐसा नही किया .अपनी जिज्ञासु प्रवृति के कारन ,मन्दिर ,मजार ,गुरूद्वारे और चर्च हर जगह की खाक छानी .मैंने हर धर्म को जानने की कोसिस की .इसलिए जिन लोगों की तुम बात कर रही हो उन जैसे लोग मुझे अजूबे लागतें हैं.तुमने "जनवाया" के जगह "बताया" लिखा होता तो मैं ग़लत न समझती.खैर मुझे अफ़सोस हैं मैंने अपनी दोस्त को ग़लत समझा.

Advocate Rashmi saurana said...

bhut sundar lekh.

vinayprajapati said...

मन को छू लेने वाला लेखन! सुन्दर!

सुजाता said...

रक्षन्दा , आपकी समझ की दाद देती हूँ ।
लेकिन "क्या हमारे स्कूलों का ये फ़र्ज़ नही कि हमारे हिंदू और सिख बच्चों को बताया जाए कि मुहर्रम क्यों मनाया जाता है? रमजान और ईद का क्या मतलब है?"
हमारे स्कूलों मे ज़रूर ऐसे पाठ प्राइमरी कक्षाओं मे होते हैं -ईद ,रमज़ान ,क्रिसमस या किसी अन्य पारसी या सिख त्योहार के विषय में।हम भी बी ए के बच्चों को प्रेमचन्द की कहानी "ईदगाह"पढाते आ रहे हैं। लेकिन बात केवल इतनी है कि याद वही बातें रहती हैं जो बार बार व्यवहार मे आती हैं।मुझे पूरा विशवास है कि आज कॉलेज मे पढने वाला कोई भी एक विद्यार्थी रक्षा बन्धन से जुड़ी विभिन्न कहानियाँ नही बता पायेगा।लेकिन बिलकुल इसी तरह जैसे कि वह न्यूक्लियर डील पर एक शब्द नही कह पयेगा।यह बहुत हद तक ज्ञान के प्रति ,जानने के प्रति एटीट्यूड की समस्या भी है।
पर सच है कि हमसे बचपन मे किसी परीक्षा मे दीवाली की तरह क्रिसमस या ईद पर निबन्ध लिखने को नही कहा गया।शायद यह पर्चा बनाने वालों की कमी रही,बच्चों की नही।

Udan Tashtari said...

बढ़िया आलेख..आभार.

अशोक पाण्डेय said...

शिकायत करने में दो मिनट भी नहीं लगते, जानने-समझने में उम्र गुजर जाती है।

असल बात तो यह है कि हम अपनी जड़ों से कट रहे हैं। अंग्रेजियत हम पर इतनी हावी हो गयी है कि अपने धर्म और अपनी संस्‍कृति के बारे में बातें करना, पुरातनपंथ करार दिया जाता है। हम अपने हस्‍ताक्षर अंग्रेजी में करते हैं। अपने बच्‍चों को अंग्रेजी नाम वाले स्‍कूल (सेंट जॉन स्‍कूल, सेंट पॉल स्‍कूल आदि आदि) में पढ़ाते हैं। अंग्रेजी त्‍योहार/दिवस(वेलैंटाइन डे, फादर्स डे, मदर्स डे, शायद दोस्‍तों के भी डे और न जाने क्‍या-क्‍या)मनाते हैं। अंग्रेजी के कुछ जुमले न डालें तो हमारी हिन्‍दी संपूर्ण नहीं होती। इतना सब के बाद भी यह आशा करना कि हिन्‍दू व सिख सिर्फ क्रिसमस ही नहीं, ईद व मुहर्रम के बारे में भी जानें तथा मुसलमान रामनवमी व शिवरात के बारे में जानें दिन में तारे देखने के समान ही है। यदि हम धर्म-कर्म की बात ही नहीं करेंगे तो उसके बारे में जानेंगे कैसे? और, क्‍या इस देश में जैन, पारसी, बौद्ध व कुछ अन्‍य मतावलंबी नहीं रहते? उनके धर्म व रीति-रिवाज के बारे में भी तो हमें जानना चाहिए। इसाईयों की ही बात लें, कितने लोग इस देश में जानते हैं प्रभु ईसा के जीवन के बारे में? आधुनिक व सेकुलर दिखने के पाखंड ने हमें अज्ञानी बना दिया है। विश्‍वास नहीं हो तो इफ्तार पार्टियों में बढ़-चढ़कर दावतें देने-लेने वाले नारावादी सेकुलरों के पारस्‍परिक धर्मज्ञान की परीक्षा लेकर देख लीजिए, सारा पाखंड सामने आ जाएगा।
हमारे गांवों में हिन्‍दुओं और मुसलमानों में एक-दूसरे के धर्मों के बारे में जानकारी, सहिष्‍णुता व सहभागिता अभी भी अपेक्षाकृत अधिक है। कारण यही है कि वहां दिखावटी आधुनिकता का प्रपंच अभी कम है। अब शहर में रहनेवाले आधुनिक दिखने-दिखानेवालों की दृष्टि वहां तक न जाए तो बात ही अलग है।

शहरोज़ said...

lambi bahas ki darkaar hai, lekin aapne jis sahajta ke saath safgoyi se apni baat rakhi hai, qabeele-tahseen hai.
comments bhi dekhe par afsos ham apni galti maannne ko bhi taiyyar nahin.
schools mein aisa barson se hota aaya hai.khaaskar privates mein.waise schools nitaant kam hain jahaaan bachchon ko id aur muhaarram ke bare bataya jaye.
jaankar taajjub hoga ki ik samay doordarshan par samachaar vachikaa ne padha tha:
harsh ullas ke saath muharram ka tyeohaar manaya gaya.
sar peetne ka man hua tha.

aur to aur ki privates sansthaanon mein muslim tyeohaaron ke liye koi ghoshit chutti nahin hoti.mere saath to kai jagah aisa hua hai k chutti ke paise tak kaat liye gaye.

hamare doston ko media ki afwaahon par jaise simi dahshat gard hai- sunayi to deta hai, par muslim bhai ka dard kya hai ise jaanne ki koshish kitne log karte hain.

hamare kai mitr hain jo bahar tto sharab aur kabab yaani maan-sewan zarur karte hain lekin unhain hamare ghar ka khaane mein unka dharmaade aajata hai.
aur khud ko progressive kahte huye seena bhi phulaye rahte hain.

Manish Kumar said...

Mujhe lagta hai ki pichhli post mein aapne jo janwaya jata hai likha tha uska aashay pichhli post mein mujhe bhi clear nahin hua tha. Par is post mein aapne jo baat kahi hai usse aapke kehne ka aashay achchi terah samajh aaya hai.

Ek doosre mazhab ke tyoharon ke bare mein janne mein shikshavidon aur aam nagrikon donon ki aham bhoomika hai. Aur aapki shikayat sahi hai ki pathya pustakon mein is baat par utna dhyan nahin diya gaya jitna diya jana chahiye. Wahin ye baat bhi sahi hai ki muslim doston ne shayad hi kabhi batcheet shyad hi is terah ke vishayon ka jikra karte hain.

Apne school ki yaad karoon to humne sabse pehle Jesus Christ ki jeevni padhi thi kyunki wo missionary school tha. Wahan Moral Science ki class mein ek rangeen parche mein isha maseeh ke jeevan ke updesh samjhaye jate the jo hum log k kahani ki terah padh lete the.

Sach kahoon to mujhe nahin lagta ki aaj ki generation ek aam hindu se bhi aap holika dahan ke bare mein poochengi to wo bata payega.
Bachpan ki mansikta yaad karoon to humein bas isi se matlab tha ki Eid aur Holi khane peene aur mauz masti ke liye aur deewali patakhe jalane ke liye hoti hai. Usse jyada agar bataya bhi gaya to humne yaad nahin rakha.

Haan bade hokar yee utsukta juroor hoti rahi ki baki dharmon ke tyohaar ke peeche ki kahani kya hai? Isliye aapka pichh li post ka prayas sarahneey laga.

डा. अमर कुमार said...

.

मान गये, गुरु..
तुम्हारे इस आलेख में सच्चाई है,
ईमानदार तो हो ही..कभी बनावट नहीं देखी...

कौन कहता है, कि बिना कंटेन्ट के और सरोकारों की परवाह किये बिना लिखा जा रहा है..
पिछली पोस्ट में शब्दों के चयन में सावधानी बरती होती, तो शायद कोई गलतफ़हमी ही न रहती..
यहाँ शब्द ही तो मायने रखते हैं, जिनसे एक दूसरे को जाना जा सकता है । तुम सफल रहीं, रख़्शंदा !

हालाँकि..
' अभी वक्त गुणवत्ता की कसौटी कसने का नहीं है - संख्या बढाने का है '
स्वामी टिप्पणी संहिता से - साभार

दिनेशराय द्विवेदी said...

पूरी दुनियाँ में कुछ सियासतदाँ हैं जो नहीं चाहते कि दुनियाँ भर के लोग आपस में घुल मिल जाएँ। वे चाहते हैं कि लोग बंटे रहें। इस या उस खाने मे। बस उन की सियासत कायम रहे। यही कारण है कि हमेशा लोगों को बांट कर रखा जाता है। ईद की पहली जानकारी मिलती है तो मुंशी जी की कहानी के हामिद के चिमटे से।
मुझे भी पता नहीं कि कभी हमने पाठ्य पुस्तक में ईद और मुहर्ऱम के बारे मे पढ़ा हो।
रक्षंदा, आप ने सही नब्ज को पकड़ा है।

Anil Pusadkar said...

satya pareshaan ho sakta hai paraajit nahi,aisa laga tumhare sath bhi yehi hua,aakhir jeet tumhare sach ki hi hui,bahut bahut badhai,bebaki ki bahaduri ki aur imaandaari ki

rakhshanda said...

thank you, अमर जी, बेहद शुक्रिया, भला आपसे जीतने की हिम्मत मुझे कहाँ थी लेकिन यहाँ जीतना मेरी ईमानदारी को था, आप जैसे सम्मानीय और ईमानदार इन्सान का इतना कह देना ही आपका एहतेराम मेरी निगाहों में और बढ़ा गया है. थैंक्स , अपना ख्याल रखियेगा.

rakhshanda said...

आप सभी का बेहद शुक्रिया जिन्होंने मुझे समझने की कोशिश की, और ये बात पूरी तरह सही है की कुसूर बच्चों का नही स्कूलों और सरकार के रवैये का है, हमारे पाठ्यक्रम है. जो हमें हमारी विरासत से दूर ले जारही हैं...ये कुर्बतें सिर्फ़ मुहब्बतें बांटती हैं...दूरियां मिटाती हैं..फिर हम अजनबी क्यों रहें?
ये सारे त्यौहार हमारे हैं, शब्-ऐ-बारात हो या राम नोवमी, दीवाली हो या ईद, अगर ध्यान से समझें तो ये कितने मिलते जुलते से हैं, और बताते हैं की हम में कोई फर्क नही, हम एक ही तो हैं...बस पहल हमें ख़ुद करनी होगी. यकीन कीजिये, नुक्सान कुछ नही होगा, फायदा और सिर्फ़ फायदा होगा. बेहद शुक्रिया आप सब का.

pallavi trivedi said...

मैं आपसे सहमत हूँ..हर धर्म , हर मज़हब के मूल में सिर्फ नेकी और अच्छाई ही होती है!सभी हिन्दुस्तानियों को हर धर्म के बारे में सामान रूप से जानकारी दी जानी चाहिए...

सतीश सक्सेना said...

रख्शंदा वाकई जीत गयी जहाँ समीर , डॉ अमर और द्वेवेदी और अनिल पुसाद्कर जैसे लोग समर्थन में आए हुए हैं ! सत्य से डरते क्यों हैं हम लोग? मेरे विचार से सिर्फ़ बचपन से हमें इस विषय पर अधिक सिखाया ही नही गया ! और हमारे मन में बैठा अविश्वास दूसरा कारण है जिसमे दूसरे पक्ष कों हिन्दुओं के ख़िलाफ़ ही बताया गया है ! कोई भी मुस्लिम या हिंदू कट्टर हो सकता है सिर्फ़ एक पक्ष पर लांक्षण नही लगाया जाना चाहिए ! अगर हमने अपने आपको नहीं बदला तो इससे बड़ा अहित हम अपने देश का कर ही नही सकते ! आज जब विश्व में हमारा देश नईं ऊँचाइयों कों छोने का सोंच रहा है तब हम अपने आपको संकीर्णता के दायरे में लेकर नही जी सकते ! ये बाधाएं हमें ही तोड़नी होंगी !
जरा इनके स्थान पर ख़ुद कों रख कर सोचिये कैसा लगेगा अगर हमारे बच्चे किसी मदरसे में पढ़ते समय नबी के बारे में तो सब कुछ जाने तथा निबंध लिखें और होली दीवाली के दिन मुंह लटका कर स्कूल से बापस आते तो आपको कैसा लगता.....
बचपन से इनको गाली दे, क्या बीज डालते हो भारी
इन फूलों कों अपमानित कर क्यों लोग मनाते दीवाली ?
हमें देश कभी माफ़ नहीं करेगा इस जहर कों अपने दिलों में वसाए रखने के लिए, नया समय है नयी सोच और निगाहों से देखें ! गले लगायेंगे हम इन्हे बेहद प्यार से आज नही तो कल .....

सतीश सक्सेना said...

मुझे अच्छा लगेगा कि मैं शहरोज भाई की पोस्ट कों ट्रांसलेट कर यहाँ पेश करूँ.....

"लम्बी बहस की दरकार है , लेकिन आपने जिस सहजता के साथ साफगोई सि अपनी बात राखी है , कबीले -तहसीन है .
कमेंट्स भी देखे पर अफ़सोस हम अपनी गलती मानने को भी तैयार नहीं .
स्कूल्स में ऐसा बरसों से होता आया है .खासकर प्रायवेट्स में .वैसे स्कूल्स नितांत कमहैं जहाँ बच्चों को ईद और मुहार्रम के बारे बताया जाए .
जानकर ताज्जुब होगा की इक समय दूरदर्शन पर समाचारवाचिका ने पढ़ा था :
हर्ष उल्लास के साथ मुहर्रम का त्यौहार मनाया गया .
सर पीटने का मन हुआ था . जी
और तो और की प्रायवेट संस्थानों में मुस्लिम त्येओहारों के लिए कोई घोषित छुट्टी नहीं होती .मेरे साथ तो कई जगह ऐसा हुआ है कि छुट्टी के पैसे तक काट लिए गए .
हमारे दोस्तों को मीडिया की अफवाहों पर जैसे सिमी दहशत गर्द है - सुनाई तो देता है , पर मुस्लिम भाई का दर्द क्या है इसे जानने कि कोशिश कितने लोग करते हैं .
हमारे कई मित्र हैं जो बहार तो शराब और कबाब यानी मान -सेवन ज़रूर करते हैं लेकिन उन्हें हमारे घर का खाने में उनका धर्म आड़े आजाता है .
और ख़ुद को प्रोग्रेसिव कहते हुए सीना भी फुलाये रहते हैं ."
-शहरोज

अनुराग said...

क्या आपने कभी छोटे बच्चे को किसी पूजा या मन्दिर में देखा है ?मन्दिर में उसका ध्यान घंटी पर होता है ओर पूजा के वक़्त उसका ध्यान पड़ोस के दूसरे बच्चे पर .....ऐसे ही मस्जिद में जाते बच्चे का ध्यान कंचो पर रहता है .....ओर सच जानिये भगवन हो या अल्लाह (मेरे मुताबिक तो एक ही है )उस मन्दिर में-मस्जिद में खड़े तमाम लोगो से ज्यादा उन बच्चो को सबसे बड़ा नमाजी मानता है .....मैंने कभी एक नज़्म भी लिखी थी इसी thought पर .....

मेरी wife की छोटी बहन की शादी राजिस्थान में हुई है (वो बात ओर है की वे लोग मुंबई में रह रहे है )परसों फ़ोन पर बात हुई तो उसने बताया की उसके यहं तीज का त्यौहार है ...कुछ कुछ करवा चौथ जैसा ...मेरी wife ने कहा अच्छा ....यहाँ तो किसी को कोई आईडिया नही....जाहिर है कुछ जगह से भी त्यौहार बदल जाते है ..सच मायने में मुझे नही मालूम की करवा चौथ क्यों मनाते है ?दरअसल हम जिस देश में रह रहे है उस देश की आज की जेनरेशन "गाँधी "को मुन्ना भाई ओर "भगत सिंह "ओर "बिस्मिल "को रंग दे बसंती से पहचानती है.....उसे शाहरुख़ खान की ॐ शान्ति ॐ का गाना याद होगा पर उसे अगर पूछा जाए भगत सिंह को फांसी किस दिन ओर कहाँ दी गई ये पता नही होगा ?मै जिस माहोल में रहा हूँ हमने हिंदू मुस्लिम मोहब्बत भी देखि है ओर उसकी शादी में गवाह भी बने है
ओर उनके यहाँ जम के दावते उडाई है .अब भी उडाते है...
....पर न उसे हमारे त्यौहार पता थे की क्यों होते है न मुझे उनकी डिटेल .पर इससे हमारी दोस्ती में कोई फर्क नही पढ़ा ......मेरी किताबो के शेल्फ में शहरयार,निदा फजिली ,बशीर बद्र ,जावेद अख्तर ,ग़ालिब ...गुलजार ,अमृता प्रीतम ,शिवानी.कमलेश्वर ,खुशवंत सिंह के साथ बिना किसी भेदभाव के मौजूद है ....मेरे बेटे को सिर्फ़ इतना मालूम है की मेरी पढने की दो ही किस्म की किताबे है (अभी वो ४ सल् ओर कुछ महीने का है )एक मेरी मेडिकल की दूसरी नज़्म की......ये बेहद छोटी बातें है ....हाँ आपकी इस बात से इत्तिफाक रखता हूँ की एक दूसरे के त्यौहार के बारे में कोई जानकारी मुहय्या कराने के जो जरिए पहले था वो था पड़ोस ,मोहल्ला ओर आपसी रिश्ते वो शहरीकरण के कारण अब सब पीछे छूट गया है.

सच जानिए अपनी दो तीन हिंदू सहेलियों से पूछिए की रक्षा बंधन क्यों मनाया जाता है ?होली क्यों मनाई जाती है ?मै यकीन से कह सकता हूँ उन्हें नही पता होगा.....आप बेहद जहीन ओर प्यारी इन्सान है ...इसलिए आप जैसे लोगो में मुझे इंसानियत का जज्बा दूसरे लोगो से ज्यादा दीखता है....तो इन बातो से कोई पैमाना न बनाईये किसी को मापने का ...यही इल्तिजा है.

सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी said...

रक्षन्दा जी, आपकी दोनो पोस्टें और उनपर प्राप्त टिप्पणियाँ आज ही पढ़ सका। इस पूरी लिखा-पढ़ी का परिणाम काफ़ी अच्छा होना चाहिए। जैसे जमें हुए पानी में बहाव आ गया हो और बहते पानी की निर्मलता से सभी नहा रहे हों। बहुत अच्छा संवाद हुआ...। यह आपके प्रयासों की जबर्दस्त सफलता है। मुझे विश्वास है कि दोनो पड़ोसियों को कुछ कदम नज़दीक लाने में आपकी इस भूमिका को जरूर सराहा जाएगा। कम से कम ब्लॉग जगत के आँगन में तो अवश्य ही... तहे दिल से शुक्रिया।
वैसे बचपन में हम बगल की बाजार में ताज़िया का मेला जरूर देखने जाते थे जब हम लोगों को ‘मेला करने के लिए’ पैसे भी मिलते थे। साल भर इसका इन्तज़ार रहता था। वह मेले का दृश्य हमारे स्मृति पटल पर आज भी ताज़ा है।

अभिषेक ओझा said...

हम्म... बड़े-बड़े लोगों की टिपण्णी में ये अदना आदमी क्या कहने की हिम्मत कर सकता है ? हाँ मनीषजी की तरह ही हमने भी मिसनरी स्कूल में मोरल की किताब में जीसस से ह इ प्रारम्भ किया. पर हाँ उसके पहले चौथी कक्षा में एक मुहम्मद साहब की जीवनी भी थी.
मुझे पाठ्यक्रम में कोई कमी नहीं दिखती... जहाँ भी उत्सवों का जिक्र आता है, समान रूप से ही आता है... पुस्तकें तो अच्छी हैं... बस पढने और पढाने में फर्क है !

sumati said...

main kuchh kahun kya ya jane dun ...keh leta hun....
kaun kehta hai ki hum ek hain aur aisa kehne ki jarurat kyun aanpadi ..aap bataeye kya huamara khanpan ,rehan sehan .reetriwaz,rishte nate,paramparayen ek hain ...unhen ek karne se pehle hi ye ghoshdan karne wale aap kaun hote hain ..aap buniyadi baton se bhag rahe hain aur ek aisi fantasi rach rahe hai jis ke bhram main hum ne sadiyan kat deen...aap ab bhi betartib se baton se saman bandhne ki himmat rakh sakte hain to rakhen lekin aitarz hai mujhe..aap jaise fantasi ki soach humen yathart se dur le jarahi hai ...main hinduvadi nahin hun na hi kisi party ka warker neta aadi nahin hun per mujh afsos hota hai ye bachkani baten hum hindustani log bahut karte hain ....han esa hona chahiye ..ek desh main ek jaisi socio-economic back ground ke logon ko pragati ke liye sajha platform banana chahiye hindu ka parichaye musalmanon ke dharm se ya eska ulta karke kitni pragati hanth aayegi ..awal to bhinntayen dehk kar bachha jo s fark ko nahin janta tha jane ga aur apne ko gair dharmiyou se alag manega
kya hona chahiye....a plan for next few generations...jis main hum -aap jo mujh se sahmat hain yahin aakar apne vichar den shayad koi rasta nikle... filhal rakchhanda ji etna hi aage mauka mile to mere blog per aaiye ga "incomplet-sumati.blogspot"
hoskta hai main bhi kahin galat houn
sumati

rakhshanda said...

@सुमति-- सब से पहले शुक्रिया, अच्छा लगा की आपने अपनी राय का इज़हार किया, अपनी राय का ईमानदारी के साथ इज़हार करना हमेशा मुझे पसंद रहा है इसलिए मैं आपकी इज्ज़त करती हूँ.
लेकिन ये जानकर दुःख हुआ की हमारे ही देश में रहने वाले लोगों की एक दूसरे के प्रति कैसी सोच है, ठीक है की हमारे रीत रिवाज थोड़े अलग हैं लेकिन थोड़ा सा ध्यान से देखें तो इनके रंग क्या आपको आपस में मिलते हुए दिखाई नही देते? हम ईमानदारी से इन्हें अलग रखते हुए भी एक साथ देखने की कोशिश करें तो क्या ये आपको एक से दिखाई नही देते? खैर ये अपनी अपनी सोच पर निर्भर करता है. लेकिन आपने बड़ी ईमानदारी से अपनी राय का इज़हार किया है इस बात के लिए मैं आपकी दिल से इज्ज़त करती हूँ. शुक्रिया.

डा. अमर कुमार said...

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वैसे तो रख़्शंदा, ख़ुद ही इस लायक हैं,
कि इन मुद्दों पर पुरज़ोर तरीके से अपना नज़रिया खुद ही रख सकें ।
शायद उन्हें यह पैरोकारी नागवार भी गु्ज़रे, कोई ताज़्ज़ुब नहीं, अपने मेल इनबाक्स में ' सुमति साहब ' को मौज़ूद पाकर चला ही आया..

@ Sumati तो अर्ज़ ये है..ज़नाब* कि आप अपनी बात रखने में बिफ़र से पड़े हैं, बहस ज़ारी है.. कोई झगड़ा नहीं ? पहले तो गौर करें, कि किसी आरज़ू से ही आपके वालदैन ने आपका यह नाम रखा होगा, सो.. किबला उनको तो मायूस ना ही करें ।

* आपने जिस तरह से ख़ानपान व तौर तरीकों के तफ़रके का ज़िक्र किया है, वह मुझे पच नहीं रहा..मिज़ोरम तो दूर की बात है, आसाम या केरल का एक चक्कर लगा आयें, और मारवाड़ी भोजनालय भूल कर, लोकल ढाबों में घूम आयें । आप भूखे ही लौट आयेंगे, मज़हब तो आप पेट भरने के बाद ही पूछेंगे, ना !

* सिक्किम के देहाती इलाकों तक में, रात के 11 बजे नौज़वान लड़कियों को गुमटियों में खाने-पीने का मतलब भर का सरंज़ाम चलाते देख, मेरी बीबी तो क्या मैं भी दंग रह गया था । पीना ..बोले तो शराब परोसना, इसी देश के दूसरे हिस्सों में 20-22 साल की चिट्टी लड़की को बेहिचक - बेख़ौफ़ शराब सर्व करते देख किसी को भी गश आ सकता है ।

* भाषा तो खैर छोड़िये ही, यहीं पर ताऊ हरयाणवी ठेल रहे हैं, वहीं 'छम्मकछल्लो' मैथिली की पहचान बनाने में जुटी हैं । क्या इन दोनों उदाहरणों को हिंदी चिट्ठाजगत से निकाल बाहर कर देना चाहिये ?

* मित्र, उग्र प्रतिक्रियावादियों ने ही, अपने बंधुओं को अलग अलग रहने को मज़बूर किया है । मेरा बेटा या भाई यदि पड़ोसियों द्वारा बहका लिया जाता है, तो मुझे अपने घर के तौर-तरीकों पर दुबारा विचार करना चाहिये, न कि ज़ूतमपैज़ार ! दलितों को दलित बनाये रखे जाने में किसी बाहरी मुल्क या कौम का हाथ नहीं है, और वह क्या हिंदू नहीं हैं ? कम से कम टैग तो यही दिखाया जाता है , क्यों ?

* हमने लोगों को काटना ही सीखा है, अब सिर्फ़ पैकिंग गत्ता ही शुद्ध रह गया है, किंतु संतोष है, कि आवरण ही सही पर है तो शुद्ध ना ?

* क्या छू लेने मात्र से कुछ अपवित्र हो जाता होगा ? यदि यह इतना नाज़ुक है कि हर घड़ी इसकी शुद्धता बनाये रखने की ख़ामख़्याली में हमने सदियाँ ज़ाया कर दीं !

* मैं अमर कुमार एक पारंपरिक हिंदू परिवारिक संस्कृतियों का उत्तराधिकारी, जो प्याज़ और लहसुन तक नहीं खाता है, खुले आम लानतें भेजता है हर उस धर्म पर, जो इतना नाज़ुक है कि हरिजन से अशुद्ध हो जाता है याकि हम काफ़िरों से ख़तरे में पड़ जाया करता है । बहलाने की बाते यह हैं, कि यह हमारी रक्षा कर रही हैं .. और हम खून बहा कर शहीद हो रहे हैं, छिः !

* ताज़्ज़ुब नहीं कि, एक गैर-मज़हबी लड़की के ब्लाग पर ज़बरन उसकी पैरवी कर रहा हूँ, तो कई बुढ़ऊ, इस बुढ़ऊ पर हँस रहे हों ?
अब उनसे क्या शिकवा, जो अब क्या ख़ाक मुसलमाँ होंगे ?

* रख़्शंदा, मैं इज़ाज़त चाहूँगा कि इस टिप्पणी को अपने ब्लाग पर भी ले जाऊँ, इतना वक़्त यहीं दे दिया । आज छुट्टी के दिन, अब कोई पोस्ट लिखने का मन बनाया, तो पंडिताइन सा्बूत ना छोड़ेंगी !

* और सुमित, भाई तुम भी गौर करना कि तुम्हारे ब्लाग का पता Incomplete सा क्यों है ? कोई नतीज़ा निकालने की ज़ल्दबाज़ी ही तो तबाही ला रही है । कौन किससे नहीं डर रहा है.. पर आख़िर क्यों ?

सतीश सक्सेना said...

डॉ अमर कुमार को पहली बार इतना संजीदा देखा, अन्यथा वे हँसते हुए ही बात कहने के आदी हैं ! सुमति साहब को मैं भी कुछ कहना चाहता था पर बड़े भाई ने कह दिया ! सादर प्रणाम इस बड़प्पन को, इससे बच्चों में हौसला बढ़ता है ! इससे रख्शंदा में हिम्मत अफजाई होगी !

महेंद्र मिश्रा said...

bahut badhiya post sadagi se paripoorn abhiyakti ke liye dhanyawaad.

rakhshanda said...

अपनी अबतक की जिंदगी में कुछ गिने चुने लोग हैं जिनसे मैं बेहद प्रभावित हुयी हूँ. आज उन लोगों में बड़ी आसानी सी आप विराजमान हो गए हैं अमरजी, सच कहूँ तो आप जैसे लोग मैंने कम ही देखे, और हकीकत भी शायद यही है की आप जैसे लोग होते ही कम हैं. दिल से कायल हो गई हूँ आपकी, मेरे बाबा की यद् दिला दी आपने, आज जो मकाम आपका मेरे दिल में है, वो शायद लफ्जों का मुहताज नही है इसलिए ये बात यहीं रहने देते हैं.

विक्रांत बेशर्मा said...

नही....आप बुरा बड़ी जल्दी मान जाते हैं, लेकिन सच्चाई को स्वीकार नही करते, अरे , हम करीब आना चाहते हैं, आप को अपने करीब लाना चाहते हैं लेकिन आप आने तो दें..हम जितना करीब आयेंगे,दूरिया उतनी ही मिटेंगी,ये त्यौहार दूरियां मिटाते हैं, एक दूसरे के करीब लाते हैं, और जब हम एक हैं तो एक होने से डरते क्यों हैं?

बहुत ही सही कहा आपने करीब आने से ही दूरियां मिटेंगी...बहुत ही ईमानदारी से आपने यह पोस्ट लिखी है

राज भाटिय़ा said...

रक्षन्दा भई हम ने तुम्हे गलत नही समझा था, बस तुम्हारी गलती बताई थी की इस बात को ऎसे लिखती तो अच्छा रहता,वेसे मे तो अपने धर्म के बारे ज्यादा नही जानता तो ... मुझे धर्म से ज्यादा इंसान प्यारा हे, ओर इंसानो से प्यार करना ही मेरा धर्म हे

मीत said...

aapka, lekh bahut hi behtrine hai rakhsnda ji..
lekin apne jin muddon ko uthaya hai in sab ke liye kahin na kahin jimmewar hum hi hain...
bahrhal aise hi jagaiye soto ko nind se...

Tarun said...

Sehmat hoon, bahit sahi likhai hai aapne......sabse bariya jo line mujhe lagi woh thi is post ka title.

"VISHAL" said...

aapka lekh katu hai lekin sachchai hai

PREETI BARTHWAL said...

भाटिया जी की बात से मैं सहमत हूं, हमें धर्म से ज्यादा इंसानियत को अपनाना चाहिए।

Suresh Soni said...

ur ideas are great, halanki hamare andar itni budhdhi nahi hai magar fir bi samajh sakte hai. best wishes.

vaise, I belive in KISS

Keep It Simple Stupid

bhaayo

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