Monday, May 19, 2008

abhi to subah ke maathe kaa rang kaalaa hai... अभी तो सुबह के माथे का रंग काला है......


एक माँ जब तकलीफ में होती है तो उसका दर्द, उसकी तड़प उसकी अपनी औलादों में एक बेटे की बनिस्बत सब से ज्यादा उसकी बेटी महसूस करती है. ये बात पूरी तरह सच साबित हो चुकी है. अपवाद हर जगह होते हैं , इस जगह भी होंगे लेकिन एक माँ को जितना बेटी समझ सकती है , शायद बेटा नही.

लेकिन उसी बेटी का वजूद , माँ को बीमारियां देने का बाएस(वजह) बनने लगे तो सोचिये , कैसा महसूस होता है. लेकिन बदकिस्मती से रिपोर्ट यही कहती है..

हाल ही में दून के एम्.के.पी. कॉलेज के सायिकालोजी डिपार्टमेन्ट ने अपनी एक रिसर्च के बाद ये खुलासा किया है कि दो बेटियों के बाद प्रेग्नेंट होने वाली माएं हाई ब्लड प्रेशर,एन्जाईटी , डाईबिटीज़ और डिप्रेशन जैसी बीमारियों में मुब्तेला (ग्रुस्त) हो जाती हैं.

इस में शहर के २५० जोडों (दम्पति) के सैम्पल लिए गए थे जिस में से दो बेटियों वाली माओं में तीसरी बार प्रेग्नेंट होने की सूरत में बीमारियों के निशान उजागर हुए .

इस रिसर्च में तीन तबकों(वर्गों) को शामिल किया गया था.पहला प्रेग्नेंट औरतें ,दूसरा गायनेकोलाजिस्ट और रेडिओलाजिस्ट और तीसरा , समाज और कानून .तीनों तबकों से जो बातचीत की गई उसके नतीजे में ही नक़ल कर सामने आया कि पहली प्रग्नेंसी के दौरान औरत किसी तरह के तनाव या फिक्र (चिंता) में नही होती. उस वक़्त बस सेहतमंद(स्वस्थ) औलाद ही उसकी पहली ख्वाहिश होती है.
पहली बार जब उसके यहाँ बेटी जन्म लेती है तब भी उसकी खुशी में ख़ास कमी नही आती. पहली बेटी निहायत लाड प्यार में परवरिश पाती है. लेकिन --दूसरी बेटी होते ही हालात में एकदम ही काफ़ी बदलाव आजाता है.

ये तब्दीली परवरिश को लेकर नही , बल्कि माँ के मन में पलने वाली फिक्र को लेकर होती है. उनके मुस्तकबल (भविष्य) के बारे में सोचने वाली माँ में पहली बेटी के बाद दूसरी बार बेटी की चाह नही दिखाई दी.और दूसरी के बाद तीसरी बार प्रेग्नेंट होने वाली माएं तो इस बार बेटी ना हो , इस खौफ को लेकर बीमारी का ही शिकार हो गयीं.

रिसर्च में इस बात का भी खुलासा हुआ है कि दूसरी मर्तबा भी बेटी होने की सूरत में अक्सर मियाँ बीवी(पति पत्नी ) के आपसी रिश्ते भी मुतास्सिर (प्रभावित)हो जाते हैं . रिश्तों में खिंचाव आने लगता है. इसके पीछे उनकी फैमिली का दबाव या परिवार में बच्ची की पैदाईश को लेकर हो रही टेंशन भी एक वजह बन कर उभरी.

सब मिला कर नतीजा साफ तोर से ये निकल कर सामने आया कि बेटी के जन्म पर उदास ना होने वाले लोग भी दूसरी और तीसरी बेटी के हामी नही होते.

एम्.के.पी. कॉलेज की मनोविद डा.गीता बलोदी के मुताबिकदो बेटियों की माओं के ब्लड प्रेशर, डिप्रेशन जैसी बीमारियों में मुब्तेला होने के पीछे वजह सोसिएटी का दबाव भी है. इसके अलावा ससुराल वालों का प्रेशर तो काम करता ही है. कुल मिला कर दो बेटी के बाद माँ के मन में बस यही फिक्र दिखायी दी कि कहीं तीसरी भी बेटी हो……

ये रिसर्च और इसकी रिपोर्ट सिर्फ़ एक शहर की नही है, कम--बेश यही हालात छोटे शहर से लेकर बड़े शहर हर जगह हैं.

हैरत तो तब होती है जब एक अखबारी रिपोर्ट के मुताबिक, एन.आर.आई भारतीयों में एक सर्वे के दौरान पाया गया कि पहली बेटी के जन्म के बाद बेटे की ख्वाहिश उन में इस कदर होती है कि कई बार लिंग परीक्षण के बाद वो बड़ी आसानी से अबार्शन करवा देते हैं. सर्वे के मुताबिक, हैरानी की बात ये है कि अप्रवासी हिन्दुस्तानियों को हाई एजोकेटेड लोगों में शुमार(गिना) किया जाता है.

जब इतने पढे लिखे लोगों की, जिन्होंने अपनी हाई एजोकेशन की बदौलत दूसरे मुल्कों में अपना लोहा मनवाया है, ये मानसिकता है तो ज़रा सोचिये कि गाँव देहात के उजड्ड देहाती लोगों का क्या हाल होगा.

ऐसा नही है कि हालात बिल्कुल नही बदले .औरतों ने अपने हुकूक (अधिकार )मनवाये हैं. लड़कियों की ताक़त उनको तकरीबन(लगभग) हर तरफ़ मिल रही कामयाबी से ज़ाहिर भी हो रही है. लेकिन अभी बहुत कुछ बदला जाना बाकी है.

इन बदतरीन हालात की वजह अगर जेहालत (अशिक्षा) होती तो तब्दीली की उम्मीद आसान थी लेकिन जेहालत अगर पढे लिखे दिमागों में भरी हो तो हालात का बदलना आसान नही होता.

वूमनस डे मनाते हुए अकसर लोग समझते हैं कि हालात बदल चुके हैं . लेकिन सच तो ये है कि अभी अँधेरा बहुत गहरा है.इस घने स्याह अंधेरों में कहीं कहीं रौशनी की किरनों की झिलमिलाहट आने वाली सुबह की झलक ज़रूर दे जाती है, लेकिन ये अंधेरे अभी बहुत देर तक आने वाली सुबह की सफेदी का रास्ता रोकेंगे

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अपने प्रिय पढने वालों से ------- तबियत की खराबी की वजह से मुझे आप सब से इतने दिन दूर रहना पड़ा, चाह कर भी इस बीच कुछ नही लिख सकी, ना ही आप सब को पढ़ सकी, उम्मीद है आप सब का प्यार उसी तरह मेरे साथ रहेगा...खुदा करे आप सब अपनी -अपनी जगह बिल्कुल ठीक हों (आमीन)
रख्शंदा

Wednesday, May 14, 2008

its a death of human being...इंसानों का नहीं , इंसानियत का क़त्ल-ऐ-आम


इंसान को बोलने वाला जानवर कहा जाता है. लेकिन जो खूबी(गुण) इंसान को मख्लूकों में अशरफ (जानदारों में सर्वश्रेष्ठ ) यानी अशरफुलमख्लूकात बनाती है और फरिश्तों से भी अफ़ज़ल (श्रेष्ठ) करार देती है वो है गुनाह की हिस रखते हुए भी गुनाह करने की ताक़त .

सच तो ये है कि इंसान अगर ख़ुद को पूरी तरह काबू (कंट्रोल) में रखे तो उस से ज्यादा ताक़तवर कोई नही.

लेकिन बड़े अफ़सोस की बात है कि यही इंसान आज बेकाबू है और इसी खराबी ने उसे बे इन्तेहा कमज़ोर कर दिया है .तह्ज़ीबी अखलाकी गिरावट ने उसे ज़लील--ख्वार कर रखा है कि कभी कभी तो उसकी स्याह (काली) करतूतों के सामने दरिंदों या वहशी जानवरों की मिसाल (उदाहरण) देना जैसे उन बेजुबानों की तौहीन(बेईज्ज़ती ) महसूस होती है।

क्या कर रहा है इंसान?

अपने ही जैसे इंसानों को खाता जा रहा है. जयपुर में जो कुछ हुआ वो तो महेज़ (सिर्फ़) वहशतों की एक छोटी सी तस्वीर है. ऐसी खूनी तस्वीरें ,ऐसे मंज़र हर दूसरे दिन इंसान देखने और सुनने पर मजबूर है.

खुदा ही जाने कि ताबीर-ऐ-ख्वाब क्या निकले

हवा के दोष(कन्धों) पे देखा है रक्स(नाच) शोलों का

मासूम बेगुनाहों की मौत अन्दर तक आग भर देती है.दिल कहीं अन्दर से फूट- फूट कर रोता है. शायद खबरें देने वालों के लिए ये ख़बर पुरानी पड़ गई हो लेकिन उन दिलों का क्या करें जो अन्दर से खाली और वीरान हो गए हैं, उन आंखों का क्या करें जिन के आंसू थमने का नाम ही नही ले रहे।

लाशें चाहे जयपुर की हों या मुम्बई की , खून से लत पथ चेहरे मालेगाँव के हों या बनारस के .वो सारे चेहरे हिन्दुस्तान से भी पहले इंसानों के थे .

सरहदों से निकल कर देखें तो भी मंज़र वही होता है. दिल वैसे ही रोता है. झुलसे हुए वो वजूद इराक के हों या अफगानिस्तान के, बेनूर आँखें फिलिस्तीन की हों या पाकिस्तान की , चेचनिया की हों या अमेरिकन , हर लाश इंसान की होती है . हर खून इंसानियत का होता है. वो खून जिसका ना कोई मज़हब है जिसकी कोई सरहद है , कोई कौम है फिरका . खून गोरे का हो या काले का, हिंदू का हो या मुसलमान का ,हिन्दुस्तानी हो कि पाकिस्तानी, इराकी हो या फिलिस्तीनी , ये सुर्ख(लाल) ही होता है . इसका रंग एक है जो चीख चीख कर कहता है कि ये इंसानियत का क़त्ल है हम इंसान हैं तो दूसरे इंसान की मौत हमारी मौत है.
एक खुदा के सब बन्दे हैं, एक आदम की सब औलाद
तेरा मेरा खून का रिश्ता, मैं सोचूं , तू भी सोच
मैं जानती हूँ कि बहुत सारे सियासतदान इन बेगुनाहों की लाशों में भी अपनी सियासत की ठंडी पड़ चुकी रोटियाँ गरम करने की खुशबू महसूस कर रहे होंगे. लेकिन मेरी इल्तेजा(विनती) है उन लोगों से, कि खुदा के लिए इसे किसी मज़हबी या इलाकाई चश्मे से मत देखिये. अपने जैसे इंसानों की लाशों पर सियासत मत कीजिये, ये ना किसी एक पार्टी की हार है दूसरी की जीत .ये इंसानियत की हार और वहशियों की जीत है , जिस तरह इंसानियत का कोई मज़हब नही होता कोई जात नही होती उसी तरह वशियों और दहशत गर्दों का भी कोई मज़हब नही होता . उन्हें तो बस इंसानियत के खून का चस्का लग गया है. वो हमारी कमजोरी जानते हैं इसी लिए कभी जुमा के दिन इंसानों का खून बहाते हैं, कभी मंगल के दिन.

दिलों को बाँट कर हँसते खेलते मुल्क में अफरा तफरी का माहौल पैदा करना ,देश की मज़बूत जड़ें खोखली करना उनका एक मात्र मकसद होता है. उन्हें किसी मज़हब या कौम से क्या सरोकार.
अब ये हमारा फ़र्ज़ है कि हम सब एक होकर उन वशियों को ऐसी सज़ा दें कि दुबारा ये इंसानियत को दागदार करने का तसव्वुर भी कर सकें.

Sunday, May 11, 2008

बगावत के बीज.....{माँ तुझे सलाम}


एक दृश्य -- लंबा सा बरामदा ,बरामदे का आगे बडा सा सेहन (आँगन) ,आँगन में एक आम का पुराना पेड़ , सेहन के चारों तरफ बनी हुयी टेढी मेढ़ी क्यारियाँ जिन में खुद्रू(जंगली) झाडियाँ और पौधे उग आये हैं.
बरामदे में बैठी एक बच्ची, उम्र यही कोई छ सात साल के करीब , बालों की दो छोटी- छोटी चोटियां बनाये , लाल रंग का लंबा सा ढीला ढाला फराक पहने , गले में छोटा सा दुपट्टा डाले, करीब पड़ी गुडिया के गले में मोतियों की छोटी सी माला पहनाने की कोशिश कर रही है. माला पहना कर उसकी साडी ठीक करती है लेकिन फिर जल्दी ही उकता कर गुडिया परे सरका देती है और फराक की जेब से नन्हे – नन्हे बीज निकालती है और उठ कर सेहन की क्यारियों के पास बैठ जाती है . पास पड़ी लकडी से मिटटी खोदती है और वह नन्हे बीज उस में बोने की कोशिश करने लगती है.
दूर बरामदे के करीब कमरे की चौखट पर बैठी उसकी माँ बड़ी देर से बेटी के मासूम से खेल को दिलचस्पी से दिख रही है. नीले और पीले प्रिंट का कुछ बदरंग हो चुका सूट पहने , सर पर बडा सा गहरा नीला सूती दुपट्टा लपेटे जिसे गर्मी की शिद्दत भी सिर से खिसकाने में नाकाम साबित हुयी है , कलाईयों में लाल रंग की मोटी मोटी चूड़ियाँ पहने , जो हंडिया भूनते भूनते गरम हो कर अभी तक तपिश (जलन) का अहसास दे रही हैं. एकदम से बेटी को देखते-देखते जैसे कुछ याद अजाता है उसे, उजलत (जल्दी) में अन्दर जाती है और मुठ्ठी में कुछ दबाये सेहन में बेटी के पास आकर बैठ जाती है.
माँ—(प्यार से बेटी के बालों पर हाथ फेरते हुए) क्या कर रही हो बिटिया?
बेटी—(कुछ परेशान सी)ओफ्फोह अम्मा , ये बीज ठीक से बोये ही नही जारहे , बार बार ऊपर आजाते हैं.

माँ—(उसके माथे पर उभर आई पसीने की नन्ही नन्ही बूंदों को अपने दुपट्टे से पोंछती है) इन को छोडो , ये देखो , मैं तुम्हारे लिए कुछ बीज लायी हूँ, इन्हें बो कर देखो, ये आगे चल कर तुम्हें ही नही, बहुतों को छाँव और फल देंगे.

बेटी अपने बीजों को भूल भाल कर इश्तियाक(उत्सुकता) से माँ की तरफ मत्वज्जो हो जाती है।
बेटी—दिखाओ अम्मा
माँ अपनी बंद मुठ्ठी खोल देती है, कुछ छोटे छोटे बीज उसकी पसीने से भीगी हथेली में चिपके पड़े हैं.
बच्ची बड़े इश्तियाक और हैरानी से इन बीजों को छूती है.
बेटी—अम्मा , ये कैसे बीज हैं ?
माँ—ये बगावत के बीज हैं , इन्हें बो कर देखो , ये तुम्हारे मन से हर डर हर खौफ मिटा देंगे, ये बड़े हो कर तुम्हें इस दुनिया से लड़ना सिखायेंगे. जब जब समाज और यहाँ के लोग तुम्हें दबाने की या तुम्हारे हुकूक छीनने की कोशिश करेंगे, ये तुम्हारे अन्दर एक अनोखी ताक़त जगा देंगे, अपना हक छीन कर लेने की ताक़त.
बच्ची बड़े ध्यान से उन बीजों को देखती है.
बेटी—अम्मा एक बात पूछूं?

माँ—पूछो बिटिया
बेटी—अम्मा क्या तुम ने ख़ुद ये बीज नही बोये?

माँ-- ( बड़ी हसरत से बेटी को देखते हुए) नही बिटिया,क्योंकि मेरी माँ ने मुझे ऐसे बीज बोने को कभी नही दिए
बेटी-- क्यों? क्या उनके पास ये बीज नही थे?
माँ--नही , उसके पास दूसरे बीज थे,जो उसने मुझे दिए थे।
बेटी--कौन से बीज अम्मा?
माँ--वहशतों के बीज, मैंने वही बीज बोये,उन्होंने मुझे डरना सिखाया , कभी समाज से कभी खानदान और उसकी इज्ज़तों से ,कभी बाप और भाईयों से , कभी शौहर और उसके खानदान से , ये जितने बड़े होते गए, मुझे और खौफज़दा करते चले गए ,मैं डरती रही और सब मुझे डराते गए.

बच्ची गौर (ध्यान) से माँ की वीरान आंखों में देखती है.
बेटी--अम्मा,तुम वो बीज मुझे नही दोगी?
माँ--(बेटी के गले से पसीने से भीगा दुपट्टा निकालते हुए) नही, कभी नही ,वो बीज मेरे साथ मेरी कब्र में दफन हो जायेंगे.
बच्ची देख रही है, माँ की वीरान बंजर आंखों से आंसू की एक सफ़ेद मोतियों जैसी बूँद उभर कर पहले पलकों की मुंडेर पर अटक जाती है और फिर टूट कर उसके साँवले रुख्सारों(गालों) पर फिसलती चली जाती है.
वो माँ की मुठ्ठी में चिपके बीज अपनी हथेलियों में भर लेती है और लपक कर माँ से लिपट जाती है।
happy mothers day

Monday, May 5, 2008

तन्हाई की ये कौन सी मंजिल है रफीको ?


कहते हैं शामें अकसर उदास कर दिया करती हैं.खासकर जाते हुए दिन के उजाले,आते हुए अंधेरों से जब गले
मिलते हैं तो जाने क्यों दिल अपने आप उदास हो जाया करता है.
जिंदगी की शामें तो इन शामों से भी अजीब होती हैं.
ये शामें तो अपने साथ उदासियों के साथ साथ ढेर सारी तन्हाइयां भी ले कर आती हैं.
बात कुछ महीनों पुरानी है,अखबार में शहर के पन्ने पर एक ख़बर कुछ यूँ थी. डालनवाला इलाके में एक बुजुर्ग
दम्पति मिस्टर एंड मिसेज़ कपूर की हत्या---
ख़बर तफसील(डिटेल)से कुछ यूँ थी कि डालनवाला इलाके में अपने बंगले में दोनों पति पत्नी की हत्या रात के
किसी समय कर दी गई. हत्या के अगले दिन दोपहर तक किसी को इस वारदात का पता नही चला.करीब चार बजे पड़ोस की मिसेज़ ओबराय किसी काम से उनके गेट के अन्दर गयीं,बंगले में चारों तरफ़ खामोशी थी.उन्होंने दोनों को कई आवाजें दीं.उन्हें ये देख कर भी हैरानी हुयी कि उस दिन का अखबार अभी तक घर के बाहर ही पड़ा हुआ है. तभी उनकी निगाह ड्राइंग रूम के दरवाज़े के नीचे से आती हुयी खून की पतली धार पर पड़ी जो अब जम चुकी थी. ये देखते ही वो चीखने लगीं.उनकी चीख से पड़ोस के और लोग जमा हो गए.
पुलिस को इत्तेला (ख़बर)दी गई.दरवाजा खोला गया तो अन्दर जिंदगी के सारे निशान मिट चुके थे.
बड़ा ही भयानक मंज़र था.
श्रीमती कपूर की लाश किचन के बाहर पड़ी थी तो मिस्टर कपूर ड्राइंग रूम के सोफे के करीब खून से लथ-पथ
पड़े हुए थे.
अखबार में उनके ड्राइंग रूम का मंज़र दिखाया गया था.वो मंज़र(दृश्य)मुझ से आज तक नही भूलता.
हाँ,हमारी उनसे अच्छी पहचान थी.वो अकसर हमारे घर आया करते थे.
दोनों पति पत्नी बहुत ही मिलनसार और खुश मिजाज तबियत के मालिक थे.ज़िंदगी से भरपूर.
हर कोई उनकी इस दर्दनाक और दुर्भाग्य पूर्ण मौत पर आंसू बहा रहा था.लेकिन अफ़सोस कि इन आंसू बहाने
वाली आंखों में उनके अपने बच्चों की आँखें नही थीं.
आंसू बहाने वाली वो आँखें थीं तो लेकिन सात समंदर पार,कपूर अंकल के दोनों बेटे फैमिली समेत अमेरिका में
मुकीम हैं.
उन्हें इस सानिहे(दुर्घटना)की इत्तेला (ख़बर)तो फ़ौरन दे दी गई थी लेकिन वो इतनी जल्दी कैसे सकते
थे.कितनी अजीब बात थी,अभी कल तक सब के नजदीक वो दुनिया के खुश किस्मत तरीन इंसानों में से एक थे.
दोनों बेटे बहुत कम उमरी(कम आयु)में तरक्की की सीढियां चढ़ते हुए अपनी अपनी मंजिल पा चुके थे.एक डॉक्टर
था तो दूसरे ने मैनेजमेंट में डिग्री ली हुयी थी.
डालन वाला देहरादून के पोश इलाकों में से एक जाना जाता है.वहां अपने खूबसूरत बंगले में दोनों हँसी खुशी जिंदगी
गुज़ार रहे थे.
साल में एक बार बेटे परिवार समेत माँ बाप से मिलने आजाया करते थे. दो बार कपूर अंकल और आंटी बेटों के
पास अमेरिका भी हो आए थे.देखा जाए तो उनकी खुश नसीबी पर किसे शक हो सकता था.
बहरहाल पुलिस ने अपनी तरफ़ से पूरी तफ्तीश(छान बीन) की और इसे कभी लूट के इरादे से की गई वारदात तो
कभी जायदाद के कागज़ हासिल करने के लिए किया गया क़त्ल बताती रही.
दोनों बेटे आए,उन्होंने भी अपनी तरफ़ से पूरा ज़ोर लगाया लेकिन पुलिस कुछ ख़ास कामयाबी हासिल नही कर
पायी.
ये कोई नई बात नही है . देहरादून सेटल होने के बाद ऐसे कई केसेस ख़ुद मेरी नज़रों से गुज़रे हैं.
पहले के केसेस में भी ऐसा ही होता रहा है.
क़त्ल होने वाले ऐसे ही तनहा बुजुर्ग थे,और कातिल बहुत कम पकड़े जासके हैं।
देहरादून में हर चौथे पांचवें घर के बेटे और बेटियाँ विदेशों में जिंदगी गुजार रहे हैं.ये इस शहर का बड़ा अजीब सा
सच है.अच्छे स्कूलों के लिए मशहूर इस शहर में दूर दूर से लोग बच्चों की अच्छी एजुकेशन के लिए आते हैं और इस शहर को अपना लेते हैं.
दसवीं और बारहवीं यानी स्कूली शिक्षा के बाद इस शहर में बच्चों के लिए कोई ख़ास स्कोप नही है लेकिन हाई
एजुकेशन के लिए बुनियाद यहाँ के अच्छे स्कूल ही उन्हें मुहैया कराते हैं.
ये उसी बुनियाद का नतीजा है कि यहाँ पढे बच्चे ऊंची-ऊंची डिग्रियाँ लेकर विदेशों में अच्छी जॉब पा जाते हैं.
जिस घर के बच्चे विदेशों में सेटल हैं उन्हें रश्क भरी निगाहों से देखा जाता है.
अहाँ आने वाले सभी माँ बाप का सपना अपने बच्चों का अच्छा मुस्तकबल(भविष्य)होता है और अच्छे
मुस्तकबल का मतलब आज के आधुनिक होते समाज के बच्चों और कभी कभी माँ बाप के लिए भी विदेश में ऊंची जॉब पाना ही है.
एक ज़माना था जब दून को रिटायर्ड लोगों का शहर माना जाता था.ख़ास कर मिलिटरी के ज़्यादा तर रिटायर्ड
लोग अपनी बकिया(बची)जिंदगी सुकून से बिताने के लिए इस शहर में बसेरा कर लिया करते थे.
शांत और खूबसूरत माहौल,हसीन मौसम और सादा से मिलनसार लोगों के बीच रहना हमेशा से पसंद रहा है लोगों
को.
इसके बाद अच्छे स्कूलों की वजह से ये पढने वाले बच्चों के वालिदैन( माता,पिता) की पसंद बनता चला गया.
वक़्त ने तब करवट बदली जब ये शहर नए स्टेट की राजधानी बन गया.
तरक्की तो काफी हुयी,लोगों को रोज़गार मिला तो दूर दूर से लोग आकर यहाँ बसने लगे.
लेकिन ये शांत सा शहर अशांत होता चला गया.
जहाँ अपराध के मामले कम से कम सुनने को मिलते थे वहां दिन दहाड़े जुर्म की घटनाएं होने लगीं.
और ऐसे में सब से ज़्यादा असुरक्षित हो गए ये तनहा जोड़े.
अभी एक साल भी नही हुआ जब ऐसे ही हालात में मसूरी में एक बुजुर्ग दम्पति को रात के अंधेरे में क़त्ल कर
दिया गया था.
मि. कपूर की तरह ही उनके दोनों बेटे विदेश में थे और बेटी मुम्बई में ब्याही थी.
कहा जा सकता है कि ये हमारी राज्य सरकार और पुलिस प्रशासन की नाकामी है कि बार बार ऐसे जुर्म दोहराए
जा रहे हैं लेकिन क्या सिर्फ़ उन्हें ही जिम्मेदार ठहराया जा सकता है?
क्या अपने बुजुर्गों के प्रति हमारे बच्चों की कोई ज़िम्मेदारी नही बनती?
अच्छी नौकरियां पाना और डॉलर भेज कर माँ बाप के प्रति जिम्मेदारियों से पल्ला झाड़ लेना काफ़ी है?
यही तो वो बच्चे हैं जिनकी उंगली पकड़ कर दुनिया की सर्द--गरम से बचाते हुए माँ बाप ने उन्हें पूरी
हिफाज़त से बड़ा किया था.
माली की तरह दिन रात अपने खून पसीने से सींच कर जिस पौधे को बड़ा किया,वही पौधा जब फलने फूलने
लगा,जब उसकी घनी छाँव में सुस्ताने का वक़्त आया तो वो पेड़ बन कर अपनी छाँव देने कहीं और जा बसा.
बेचारा माली,उस पेड़ पर लगे फूलों और फलों को तसव्वुर (कल्पना)की आंखों से देख कर खुश होता रहता है.
उसकी घनी छाँव की ठंडी राहत को तन्हाई की चिलचिलाती धुप में बस महसूस ही कर सकता है.
गलती सिर्फ़ हमारे बच्चों की नही है.ये हम ही हैं जो ऐसे सुनहरे ख्वाब ख़ुद देखते हैं और अपने बच्चों को दिखाते
हैं.
अभी कुछ महीनों की बात है,हमारी ममा माली बाबा से मस्रूफियत(व्यस्तता)का रोना रो रही थीं.तब माली बाबा
ने मुस्कुराते हुए कहा था,''अरे मैडम ,बस कुछ दिन की बात है,देखना बच्चे बड़े होंगे और चिडियों की तरह इंग्लैंड या अमेरिका उड़ जायेंगे.यहाँ इस शहर में यही होता है,फिर तो आप बूढे बूढी तन्हाई का रोना रोया करेंगे.''
ममा को उनकी इस बात ने जैसे बेतहाशा खुशी दी थी.तभी मुस्कुराते हुए कहने लगी थीं, ''बस बाबा आप दुआ
करें,इन बच्चों की खातिर ही तो यहाँ कर बसे हुए हैं.''
ये सिर्फ़ मेरी ममा का नही,यहाँ रहने वाले हर वालिदैन(माता,पिता) का ख्वाब है.
ये तो आने वाला वक़्त बताता है कि ये खूबसूरत ख्वाब रेगिस्तान में सेराब(पानी का धोखा)की तरह है.जो देखने
में बहुत हसीन लगता है लेकिन जो ताबीर में देता है सिर्फ़ अकेलापन.
आप कह सकते हैं कि जिन वालिदैन के बच्चे उनके साथ रहते हैं वही कौन सा खुश हैं. ये भी कि आज के दौर में
दूरी का फर्क कहाँ रहा,मोबाइल ,इंटरनेट और वेबकैम के ज़रिये हम पल पल की खुशियाँ आपस में बाँट सकते हैं.लेकिन मैं कहती हूँ कि सिर्फ़ खुशियाँ...
तन्हाइयां और दुःख बांटने का काम कोई मोबाइल कर सकता है ही इंटरनेट और वेबकैम.
मैं मानती हूँ कि बेहिस(संवेदनहीन)बच्चों के साथ रहते हुए भी बुजुर्ग अपने आप में तन्हा हो जाते हैं.लेकिन
सिर्फ़ मन से.
ये भी ज़रूरी नही कि सारे बेटे और बेटियाँ बेहिस ही हों.अच्छे और बुरे यहाँ भी होते हैं.
लेकिन इंसान असुरक्षित तब महसूस करता है या हो जाता है जब वो तन्हा हो.
मुझे याद है एक बार कपूर आंटी से ममा ने कहा था,''भाभी आज के टाईम में देहरादून क्या,मुम्बई क्या और
अमेरिका क्या,दूरियों का तो फर्क मिट गया है,'' तब कपूर आंटी के चेहरे पर जैसे दर्द के तारीक(अंधेरे)साए आकर ठहर गए थे.उनका जवाब मुझे आज भी याद है, उन्होंने कहा था, ''ऐसा नही है सारा ,सहूलत बहुत हो गई है पहले के मुकाबले में लेकिन पता नही क्यों,कभी कभी ऐसा लगता है कि ये सहूलतें प्यास और बढ़ा देती हैं.''
बड़ी हसरतें छिपी थीं उनके लहजे में.
सच ही तो है,क्या कानों में आती आवाजें,कंप्यूटर स्क्रीन पर हँसते और बोलते चेहरे कुरबत(नजदीकी)का वो
अहसास दे सकते हैं जो एक माँ अपने बेटे को सीने में छिपाते हुए महसूस करती है?
या एक दादा और दादी को पोते पोतियों,निवासे निवासियों की शरारतों से हासिल होता है?
क्या ये नकली आवाजें,ये तस्वीरी चेहरे बेबसी की मौत मरते हुए माँ बाप को बाहर निकल कर बचा पायी थीं?
कितनी अजीब बात है,अपने बच्चों की नाज़ुक ऊँगली पकड़ कर दुनिया की हर मुश्किलों का सामना करने वाले
वालिदैन उन नाज़ुक हाथों को मज़बूत बनाते बनाते जब ख़ुद कमज़ोर हो जाते हैं,जब उन हाथों में अपने लिए सहारा तलाश करने लगते हैं तो अहसास होता है कि वो मज़बूत हाथ तो उनके आस पास भी नही.क्योंकि वो हाथ तो डॉलर की तलाश में हजारों मील दूर जा चुके हैं.
पास बची हैं फ़क़त (सिर्फ़) तन्हाइयां.
सिर्फ़ तन्हाइयां.......