Sunday, April 20, 2008

गुज़र गई ये बहार भी किसी ज़ख्म की सूरत.....

दहेलिया
सुंदर
क्या खूब
नाज़ुकी
beautiful

कोमल
खुशबू की तरह गुजरो ,कभी मेरी गली से,
फूलों की तरह मुझ पे बरस जाओ किसी दिन
ये रंग,, ये नजाकत
बैठ कर साये--गुल में नासिर
हम बहुत रोये ,वो जब याद आया















खूबसूरत
सुर्ख और मखमली

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मौसम--बहार यानी बसंत ऋतू ,बस रुखसत होने ही वाली है. रंग बिरंगे खूबसूरत फूल अभी खिले हुए हैं पर धुप की बढ़ती तपिश उन्हें हम से अलविदा कहने पर मजबूर कर रही है.मैदानी इलाकों में तो ये मौसम रुखसत हो भी चुका है लेकिन पहाडी इलाकों में इनकी विदाई थोडी देर से होती है . पर यहाँ भी धुप की शिद्दत जल्दी ही इसे आखिरी सलाम कहने पर मजबूर कर देगी.
कितना अजीब होता है ये बहार का मौसम . कहते हैं ये शायेरों का मौसम है.शायेरों ने इसकी खूबसूरती पर दीवान के दीवान लिख डाले हैं.ये जब आता है तो कितने चेहरों को फूल की मानिन्द खिला देता है तो जाते हुए हमेशा कितनी आँखें नम कर जाता है ठीक आते हुए यौवन और जाती हुयी जवानी की तरह .
इस साल भी बहार अपनी पूरी खूबसूरती के साथ आई ,बाग़ बगीचे यहाँ तक कि रास्ते तक फूलों से ढक गए.देहरादून में वैसे भी फूल कुछ ज़्यादा ही खिलते हैं ,ये और बात है कि राजधानी बनने के बाद यहाँ जाने कितने बाग़ उजाड़ कर multiplex इमारतें ,शोप्पिंग कॉम्प्लेक्स या कोठियाँ बना ली गई.ज़ाहिर सी बात है कि फूलों के ठिकानों में तेज़ी से कमी आई है.दिन प्रतिदिन बढ़ती वाहनों की संख्या ने भी पर्यावरण को खूब नुकसान पहुँचाया और आगे भी पहुंचाएंगे ,लेकिन फूलों के करीब रहना यहाँ के लोगों की फितरत में है इसलिए बाग़ बगीचों में सही ,घरों की छोटी बड़ी लान की क्यारियों में ही सही,फूल इस बार भी खिले और इंशाल्लाह खिलते रहेंगे लेकिन फिर भी ,एक अजीब सा दर्द दे के जारही है ये बहार.अपने जाने का नही क्योंकि आना और जाना तो मौसम की फितरत है.ज़िंदगी रही तो ये लौट कर फिर आएगी ही. दुःख तो उन खोती जारही चीजों का है जो हम से रूठ गई तो शायेद हम दोबारा उन्हें वापस पा सकें.
वह चीज़ें जिनके बिना मौसम--बाहर की कल्पना भी नही की जासकती थी .
क्या खुशबुओं ,तितलियों और भंवरों के बिना भी मौसम--बहार का तसव्वुर किया होगा किसी शाएर ने?
पर ऐसा हो सकता है.
फूल इस बार भी खिले पर इन फूलों से खुशबुएँ जैसे रूठ गई थीं,मौसमी फूलों की तो बात छोडिये, गुलाब के फूल जिनकी भीनी भीनी महक रग-रग में ताजगी सी भर दिया करती थी,धीरे धीरे अपनी खुशबू खो रहे हैं.
रात की रानी चमेली ,बेला ,मोतिया,चांदनी या मोंगरा जैसे कुछ फूलों को छोड़ बाकी फूल जैसे कागज़ के खूबसूरत फूल बनते जारहे हैं .
एक ज़माना था जब घाटियों की तो बात छोडिये,गांवों और शहरों में भी मौसम--बाहर में जब हवाएं चलती थीं तो खुशबुओं से लड़ी दूर दूर तक सब के तन मन को महका दिया करती थीं.
जंगली फूल भी अपने अन्दर एक ख़ास सुगंध लिए होते थे.
लेकिन धीरे धीरे बढ़ते प्रदुषण ,मिटटी और खाद में मिले रासायनिक तत्व कब ये अनमोल शै हम से छीनते चले गए ,हम ख़ुद ही जान सके.
मुझे याद है,जब मैं छोटी थी और छुट्टियों में परिवार सहित लखनऊ के पास गाँव में स्थित दादा जान की हवेली में आया करती थी.दादा जान की तरह फूलों से इश्क मुझे वरसे में मिला है.
उनका मुहब्बत से लगाया गया बगीचा हमेशा फूलों से महका करता था. चाचा जान के बच्चे ,हम भाई बहन सारा दिन बस वहीं खेला करते थे और हमारे साथ खेला करती थीं रंग बिरंगी सुंदर तितलियाँ.कली कली को चूमती ये नाज़ुक तितलियाँ अगर डरती थीं तो स्याह गुन-गुन करते भंवरों से,और उनका खेल ध्यान से देखते हुए मेरा मासूम जेहन बेचारे भंवरों को खलनायक के रूप में देखा करता था.
मुझे अच्छी तरह याद है उन दिनों इतने रंगों की तितलियां फूलों से अठखेलियाँ करने आती थीं कि मैं हैरान रह जाती थी कि कुदरत ने कितने रंग इनके पंखों में समो दिए हैं.
आज फूलों कि वही सहेलियां लगभग गायब सी हो गई हैं बगीचों से.लान में रंग बिरंगे हसीन फूल हसरत से अपने उन पुराने दोस्तों की राह तकते- तकते मुरझा जाते हैं लेकिन उनका ये इंतज़ार ,इंतज़ार ही रह जाता है .भूली भटकी कोई तितली या भंवरा कभी भी जाते हैं तो चंद ही लम्हों में जाने कहाँ गायब हो जाते हैं.फूलों से खुशबुओं का, खुशबुओं से तितलियों का और तितलियों से भंवरों का वो अटूट रिश्ता जाने कब और कैसे टूट सा गया है और हम हैं कि अपनी तेज़ रफ्तार में सरपट भागती जिंदगी में मग्न इतनी सारी अनमोल चीजों को हमेशा के लिए खोते हुए देखे जारहे हैं पर उन्हें बचाने और समेटने की हमें फुरसत नही है.
बचाने की कौन कहे,इनके बारे में सोचने का भी समय नही है हमारे पास.
पर ये सब कुछ हमारे आने वाले कल के लिए खतरे की घंटी है.हमें कुदरत के दिए हुए इन अनमोल तोहफों को बचाने के बारे में संजीदगी से सोचना होगा.उन्हें बचाने के कारगर उपाय करने होंगे.अभी इतनी भी देर नही हुयी है.खुशबुएँ फिर से हमें मदहोश करने वापस आसकती हैं,तितलियां फिर से कलियों और फूलों को चूमती हुयी इठला सकती हैं,भँवरे फिर से गुनगुना सकते हैं.
लेकिन जल्दी ही कुछ करना होगा,ऐसा हो कि कल हमारी आने वाली पीढ़ी खुशबुओं,तितलियों और भंवरों को किताबों के पन्नों पर पढ़ते हुए हसरत से सोचा करें कि क्या ये सब भी कभी हमारी दुनिया का हिस्सा थे?

Saturday, April 19, 2008

खेल का ये कैसा तमाशा...



बड़े दिनों से जिस की चर्चा थी उसकी शुरुआत कल हो ही गई. आई. पी. एल यानी इंडियन प्रिमिअर लीग का उद्घाटन और ट्वंटी २० क्रिकेट के नए रूप की शुरुआत,जिसका एक रूप हम पहले ही आई.सी.एल के रूप में देख चुके हैं. यही वो बहुचर्चितरूप था जिसकी सारी दुनिया में चर्चा थी,चर्चा क्रिकेट को लेकर नही थी कि इस से क्रिकेट का किसी तरह का भला होने वाला था,भला तो बस क्रिकेटर सहित उन लोगों का होने वाला था जिन्होंने इस तमाशे पर बेतहाषा पैसा बरसाया था,देखना तो बस ये था कि,पैसा बरसाने वाले उसे वसूलते कैसे हैं, बहेर्हाल कल उसे भी दुनिया ने लिया,एक रंगारंग तमाशे से ज़्यादा इसे कुछ भी कहना किसी भी खेल की तोहीन होगी ।

बंगलोर का चिन्नास्वामी stadium दर्शकों से खचाखच भरा हुआ था,ये सभी लोग यहाँ क्रिकेट देखने नही आए थे ,क्रिकेट की आड़ में पैसों की रंगीनियाँ देखने आए थे,और हुआ भी यही,पूरे मैच में सिवाए newziland के ब्रेंडन मकुल्लम की लाजवाब आतिशी पारी के अलावा कुछ भी नही था,कोल्कता नाईट राइदर्स के २२२ रन के जवाब में बंगलोर रायल चैलेंजर्स की पूरी टीम मात्र ८० रनों पर सिमट गई,कोई संघर्ष तक देखने को नही मिला,विकेट गिरने पर कप्तान सोरव गांगुली का अपनी टीम के खिलाड़ियों से लिपट जाना कहीं से भी गर्मजोशी पैदा नही करता था.वो गर्जोशी और उमंग जो हमें टेस्ट क्रिकेट और एक दिवसिये क्रिकेट में दूसरे देशों के खिलाफ खेलते हुए महसूस होती है,कहीं से भी मन ये बात नही पा रही थी की हम किसी जीतते देखना चाहते हैं. मैं नही जानती कि दूसरे लोग इसके बरे में क्या सोचते हैं पर ये सिर्फ़ मेरा नजरिया है,थोडी देर देख कर ही मन उचाट हो गया.

बात जहाँ तक मकुल्लम की है,मैं उनकी पारी को लाजवाब मानती हूँ,वो सिर्फ़ एक लाख के इनाम के नही कई लाख के इनाम के हकदार थे,लेकिन फिर भी इतने चौके छक्के देख कर भी मन में कोई उत्साह नही जागा,ऐसा लगता है २०-२० क्रिकेट ने चौकों छक्कों का सारा जोश और सनसनी ही खत्म कर दी है,याद कीजिये, शाहिद आफरीदी ने अपना पहला आतिशी शतक जब मात्र ३५ गेंदों में ११ छक्कों के साथ बनाया था तो उसकी सनसनाहट कितने सालों तक हम भूल नही सके थे,श्रीलंका के सनथ जय सूरिया और सचिन तेंदुलकर कीआतिशी बल्लेबाजी कैसे दिल की धड़कनें बढ़ा दिया करती थी. क्या उसी जोश और उमंग की मात्र कल्पना भी हम यहाँ कर सकते हैं?

क्रिकेट का वो खूबसूरत रूप कभी ऐसा भी होगा,ये तो कभी कल्पना भी नही की थी मैंने.

इस सरे तमाशे में सब से ज़्यादा शर्मनाक रहा उसका उद्घाटन समारोह और उसके कार्यक्रम, ग्लैमर बढ़ाने के लिए विजय माल्या ने अमेरिका के पेशेवर चीयर लीडर तक को बुला लिया था,उसकी डांसर ने जो कपड़े पहेन रखे थे और जिस तरह से ख़ुद को दिखा रही थीं,उसे देख कर एक लड़की होने के नाते शर्म सी महसूस हो रही थी.कितनी अजीब बात है ,आधुनिक होते समाज में भी ओरत मात्र एक शो पीस बना कर रख दी गई है,आज से हजारों साल पहले राजा महाराजाओं के दरबार में उनकी और उनके दरबारियों की अय्याशी का साधन भी यही ओरत थी और आज इतने ज़माने गुज़र जाने के बाद भी वही आंखों कों ठंडक पहुँचने का जरिया है.

दौलत की इस जंग में भला ये सब सोचने की फुरसत किसे है वरना क्या यही हमारी सभ्यता है?

साउथ अफ्रीका में हुए २०-२० वर्ल्ड चम्पियाँशिप में इस तरह के कार्यक्रम हुए थे,लेकिन फिर भी इस के मुकाबले ज़्यादा शालीन थे. दूसरी बात वहां जो हुआ वो उनका culture था,लेकिन जो कल हम ने देखा,क्या ये भी हमारा culture था?

क्या लगाई हुयी लागत वसूलने के लिए हम इतना भी गिर सकते हैं?