Thursday, April 10, 2008

बेचारी तसलीमा नसरीन


आज बड़ी अजीब बात हो गई,अपर्तियाषित रूप से एक ऐसा विषय चर्चा में आगया जिस पर बात करना हमारे कालेज के लड़को की तो बात छोडिये,लड़कियों के बीच भी छिड़ना कल्पना के परे है.पर कभी कभी ऐसा हो जाता है आज ऐसा ही हुआ और विषय बनी तसलीमा नसरीन की जात.और कहने कि ज़रूरत नही कि ज्यादातर हमारी प्यारी दोस्तों की सहानुभूति उनके साथ थी और इस से मुझे कोई आश्चर्य नही हुआ. तसलीमा एक तो महिला हैं,बेचारी महिलाओं के साथ लोग जाने क्यों सहानुभूति करने लगते हैं,और सब से बड़ी बात कि उन्होंने इस्लाम की तोहीन करने की हिम्मत दिखाई. इन दोनों कारणों में से दूसरा कारण किसी भी लेखक या लेखिका को instant महान बनाने के लिए काफ़ी है.तसलीमा की बात की जाए तो उनके हालत चाहे जो भी रहे हों,एक लेखिका के तौर पर उनका आंकलन किया जाए तो वो एक साधारण लेखिका हैं.उनमें ऐसा कुछ नही था जो उन्हें महान तो क्या चर्चित बना सकता.तब उन्होंने वही किया जो उन से पहले रुश्दी जैसे लोगों ने किया था और रातों रात चर्चा का विषय तो बने ही,कुछ ख़ास लोगों की सहानुभूति के पात्र भी बन गए.ये कुछख़ास लोग, बेचारे,पता नही उन्हें इस्लाम से इतना खोफ क्यों आता है.एक आम धारणा ये है कि हम उसी चीज़ या इंसान से डरते हैं जो हम से ज़्यादा मज़बूत हो और जिस के बरे मैं हमें पता हो कि उसकी ताकत अहमदीनेजाद आगे हम कुछ भी कर लें,उसे हरा नही सकते.इस्लाम ने हमेशा लोगों को यही दिखया है.आज भी जब अधिकतर मुस्लिम देश बुरी तरह से बरबाद हो रहे हैं, आपस में बंटे हुए अपनी ही कौम का खून गैरों के हाथों दिन रात बहते हुए देख रहे हैं लेकिन अपने मुफाद,अपनी खुदगर्जी के चलते कायरों की तरह चुप हैं क्योंकि वो जानते हैं कि हसन बोलेंगे तो अपनी अय्याशियों से हाथ धोना पड़ सकता है.हर नस्रुल्लाह त्याग कर अपने से कहीं ताक़तवर दुश्मन का सामना करना पड़ सकता है और ये सब उन जैसे सुविधाओं की लोगों के चुके कायर अय्याशों के बस की बात नही है.सो वो चुप अपने ही मासूम भाई बहनों और बच्चों के खून से प्यास बुझाने वालों के तलवों को चाटते हुए रंगरलियों में मसरूफ हैं.लेकिन इस्लाम ऐसे कायरों और अय्याशों का होता तो कब का मिट चुका होता क्योंकि उसके दुश्मन कोई ऐरे गैरे नही,दुनिया की महाशक्तियां हैं जो यदि किसी को मिटाने पर आजायें तो खून की नदियाँ बहाने में उन्हें ज़रा भी देर नही लगती.लेकिन आज भी इस्लाम की ताक़त इन नाम निहाद(तथा कथित)महाशक्तियों को दुबक जाने पर मजबूर कर देती है तो वो ईरान का रूप ले लेती है.आज भी करोड़ों निर्दोषों का खून पीने वाले नर पिशाच की बोलती अहमदीनेजाद और हसन नस्रुल्लाह जैसे लोगों के सामने बंद हो जाती है .जिस इस्लाम को इमाम हुसैन (.सलाम ) ने अपने और अपने चाहने वालों के खून से सींचा था उसको दुनिया की कोई ताक़त कयामत तक मिटा नही सकेगी.क्योंकि आज अहमदीनेजाद और नस्रुल्लाह जैसे बहादुर हैं तो कल कोई और होंगे इसलिए इस्लाम की ताक़त कभी कम नही हो सकेगी और ना ही उसकी ताक़त से असुरक्षित लोगों की. ऐसे में कोई तसलीमा नसरीन और सलमान रुश्दी जैसे छिछोरे लेखकों के महान और चर्चित होने का सबसे आसान तरीका यही है जो उनहोंने अपनाया . जहाँ तक बात लेखकों की आज़ादी की है , कि किसी को भी अभिव्यक्ति की आजादी का अधिकार है तो मैं कहती हूँ कि ऐसी आजादी नहीं होनी चाहिए . इस दुनिया और समाज ने कुछ उसूल कुछ पाबंदियाँ इसीलिए बनायी हैं कि ये हमें ख़ुद पर कंट्रोल करने पर मजबूर करती हैं.जो मन में आया बोल दिया,जो मन किया पहन लिया की इजाज़त दे दी जाए तो दुनिया की बात क्या करें,हमारे अपने देश में दस बीस प्रतिशत लोग सड़कों पर नंगे घूम रहे होंगे.आप कहेंगेअरे तो क्या हुआ,हमारी मरजी,हम जो चाहे करें,ये लोकतांत्रिक देश है,अभिव्यक्ति की आज़ादी हमें हासिल है तो हम जैसे चाहें रहें.लेकिन ऐसा नही है.ऐसा होना भी नही चाहिए,आज़ादी का ये मतलब कतई नही है कि हम अपने कुंठित आचरण से आने वाली नस्ल को गुमराह करें.किसी मर्द को ये आज़ादी नही होनी चाहिए कि वो बिना इजाज़त किसी ओरत को छू सके और किसी लेखक या पेंटर को ये आज़ादी नही होनी चाहिए कि वह करोडो लोगों की पवित्र आस्थाओं का मजाक बना सके.जिस तरह डकैती और बलात्कार की सज़ा होती है वैसी ही सज़ा ऐसे लोगों की होनी चाहिए क्योंकि ये सामाजिक अपराधी हैं.कुछ intellectual लोग बड़ी उदारता से कहते हैं कि उनकी किताब पर बैन ठीक नही है,यदि उसने कुछ ग़लत लिखा है तो आप उसे सिरे से नकार दीजिये.यदि आपको अपनी आस्था पर विश्वास है तो कोई आपका क्या बिगाड़ सकता है.ऐसे लोगों के लिए मेरा जवाब है कि ऐसा कह देना आसान है वो भी दूसरे के लिए बड़ा आसान है .आग पड़ोसी के घर में लगी हो तो मशवरे देने में मज़ा आता है लेकिन यही आग जब आपके घर में लगी हो तो बोलती बंद हो जाती है.जहाँ तक हमारी आस्था और विश्वास का सवाल है तो जिसे दुनिया की बड़ी से बड़ी ताक़तें लाख सर पटकने पर भी हिला नही सकीं उसका चंद रुश्दी और तसलीमा जैसे शोहरत के भूखे लेखक क्या बिगाड़ सकते हैं.यह तो सस्ती शोहरत के लिए अपने कुंठित और विक्षिप्त विचारों को परोसकर पश्चिमी देशों की संतुष्टि कर के उनकी सहानुभूति पा लेते हैं. हैं.लेकिन दुनिया और ख़ुद ये लोग भी जानते हैं कि उनकी चर्चा कितने पलों कि मेहमान है और ये भी कि सस्ती शोहरत किसी को महान नही बना सकती.अपने घर को तमाशा बनाना वाला थोडी देर तक तो उसके घर से ईर्शिया करने वालों से सहानुभूति पा सकता है पर अन्दर ही अन्दर सहानुभूति रखने वाला भी जानता है कि ये किसी हमदर्दी के लायक नही है तथा इसे अपने घर में जगह देना कितना घातक हो सकता है.

बात जहाँ तक बैन लगा कर उसे नकारने की है तो इसके लिए एक साधारण सा उदाहरण है.यदि एक आदमी सड़क पर नंगा घूम रहा हो तो कुछ लोग तो नफरत से मुंह मोड़ कर गुज़र जायेंगे.कुछ उसका मजाक उडायेंगे तो कुछ मज़ा भी लेंगे पर कुछ नासमझ बच्चे खिलवाड़ सब हैरानी से देखेंगे और अपने कच्चे जेहन में इस विचार को आने से रोक नही पाएंगे कि क्या कारण है कि वह आदमी नंगा घूम रहा था और क्या ऐसा कोई भी कर सकता है? हो सकता है वह अपने बडों से इसकी चर्चा भी करे और बड़े उन्हें समझा भी दें कि क्या सही है और क्या ग़लत है पर सवाल ये उठता है कि हम ऐसे हालात आने क्यों दें? कुछ सरफिरे लोगों की अभिवयक्ति की आज़ादी के लिए हम अपनी आने वाली नस्ल की राह में उलझनें क्यों पैदा करें?

तसलीमा ने भारत से जाते हुए कहा कि भारत काफी बदल गया है,ये उस भारत से काफी अलग है जिसे वो सपने में देखा करती थीं. मैं नही जानती कि वो किस भारत को सपने में देखा करती थीं पर तसलीमा जी अच्छा हुआ कि ये भारत आपके सपनों के उस भारत से अलग है.कम से कम ये आज भी अपने करोड़ों देशवासियों की भावनाओं का सम्मान तो करता है,उन पवित्र भावनाओं का, जिसका मजाक उड़ा कर आप जैसे लोग अपनी शोहरत की रोटियां सेंकते हैं.

तसलीमा जी किसी को ये अधिकार नही है कि वो आजादी के नाम पर किसी की आस्था के साथ खिलवाड़ कर सके.फिर वो चाहे रुश्दी हों,आप हों या एम्.एफ.हुसैन

15 comments:

Kavi Kulwant said...

इतना बडा लेख.. पढ़ने की हिम्म्त ही नही हुई..
कवि कुलवंत
http://kavikulwant.blogspot.com

Sanjeet Tripathi said...

पैराग्राफ बदलें तो एंटर की को दो बार दबाएं इससे पैराग्राफ के बीच जगह बनेगी और पाठक को पढ़ने में आसानी तो होगी ही साथ ही आंखों को अच्छा भी लगेगा!!

सुजाता said...

आपके प्रोफाइल मे से -kya koi nayi bat nazar aati hai ham mein.. aayina hamen dekh ke hairan sa kyon hai..

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नई बात तो है डियर ,आप सोचने और लिखने लगी हैं ।
लिखो,लिख के सोचो ,सोच कर फिर लिखती रहो .........

शुभकामनाएँ

दीपान्शु गोयल said...

बहुत अच्छा लिखा है बस जरा सा बडा हो गया है। बडे लेख को दो टुकडों में कर दिया किजिए।

ankur said...

पढ़ कर बहुत दुःख हुआ | एक लेखिका जिसने अपने जीवन में स्त्रियों के अधिकारों के लिए लिखा और आवाज़ उठाई, आप उस पर ही इतना घिन्नोना इल्जाम कैसे लगा सकती है? क्या उसका दोष यह है कि उसने ऐसे कोई भी धर्म को मानने से इनकार किया जो स्त्रियों को मात्र एक उपभोग की वस्तु मानते है ????

Divine India said...

हाँ थक गया पढ़ता-2 पर लिखा ऐसे विषय पर है जिसे पढ़ता लगा की कुछ मैं भी यही सोंचता हूँ…।
बहुत हिम्मत दिखाई है…।
बहुत सारे लोग अंधी दौड़ में आगे आने के लिए यही करते हैं…।

अभिषेक ओझा said...

पोस्ट थोडी बड़ी है, ऐसे पोस्ट में कम से कम एक-आध बार तो इंटर मार दिया कीजिये :-)

वैसे मैं आपके विचार से सहमत नहीं हूँ, जहाँ तक धर्म की बात है मुझे धर्म में बहुत रूचि है और जो भी धर्म से जुड़ी चीज़ मिल जाए मैं पढ़ डालता हूँ, चाहे किसी भी धर्म की हो... और सभी धर्म अच्छी बात ही बताते हैं... और जहाँ तक दूसरो के धर्म और विचार को सम्मान देने की बात है तो इससे भी सहमत हूँ... पर जो लोग धर्म की बातों का ग़लत मतलब निकालते हैं और जब वो कुरीति का रूप ले लेता है, तब उसका विरोध करने वाले किसी भी मामले में ग़लत नहीं है... बल्कि ऐसे लोगो की जरुरत है.

हाँ व्यक्तिगत रूप से मुझे तब ग़लत लगता है जब लोग एक धर्म की एक तरफा बुराई करें और दुसरे की बड़ाई... neutral होकर कबीर की तरह धर्म की बुराइयाँ ढूंढने वाले हमेशा ही अच्छे लोग होते हैं,

आपके पोस्ट की ही तरह मेरी टिपण्णी भी थोडी बड़ी हो गई :-) अब इतना बड़ा पोस्ट पढ़ा तो कुछ तो असर होगा ही.

rakhshanda said...

aap sabhi ka bahot shukriya,,main jaanti hun ki kai log nahi bahot se log meri thinking se sahmat nahi honge,ho sakta hai kahin na kahin mujhe galat bhi samjha jaaye,lekin sach ye hai ki maine imaandaari se wahi likha jo feel kiya.thanks again.aap sabhi ke diye huye hosle mujhe aor achha likhne par majboor karenge.

Manish said...

अच्छा हैं ... आप और अच्छा लिख सकती हैं .

लिखना आसान काम तो होता नहीं . फिर भी हौसला बढाना चाहिए ....

गिरिराज किराडू/Giriraj Kiradoo said...

Visit www.pratilipi.in, possibly the first bilingual (Hindi-English),literary e-zine.

DR.ANURAG ARYA said...

सवाल आपकी लेखन प्रतिभा का नही है ,सवाल उन मुद्दों का है जिस पर आपने लिखा है ,जब पड़ना शुरू किया तो लगा कही ये भी सहानुभूति वाला वाही घिसा-पीटा लेख न हो ,पर इमानदारी से लिख हुआ लेख है .वैसे हमारे खुशवंत भी उन लेखकों मे आते है जो अपनी निजी बातचीत को किताब का रूप देकर अपने हुनर का बेजा इस्तेमाल करके बेचारे अगले बन्दे की ऐसी -तैसी फिरती है ...एक बात ओर क्या तसलीमा नसरीन को इसलिए नजरंदाज कर दिया जाए ..की वो एक महिला लेखक है ? क्या लेखकों मे भी कोई आरक्षण है ......उनकी लेखकीय योग्यता पर किसी को असहमति हो सकती है पर निरंतरता का उनमे आभाव है ..ये जरूर है की कई बार विवाद आपको लाभ भी पहुंचाते है तो हनी भी आपको उठानी पड़ती है............

Pushpendra Srivastava said...

स्त्रियों ki baat kerne wali lekika, yesi baat kahi, samaj ke pare raha, aap ka thinking.

ye लेखिका ke kilaph likha hai ya phir musalmaan hone ka sabut diya hai aapne?

umid hai aap mera esara samj rahi hongi & ye bhi umeed kerta hu ki mere quistin ka answer aap jarur dengi

डॉ.सुभाष भदौरिया. said...

मोहतरमा रक्षन्दाजी आपने जो तस्लीमाजी के खिलाफ फ़र्माया है उससे लगता है कि आप ने उन्हें एक एंगल से देखा है.
किसी भी मज़हब के खिलाफ गुस्ताखी करना मैं भी जाइज़ नहीं समझता.पर ये मज़हब ही जब औरत के शोषण का ज़रिया बन बैठे तब क्या किया जाय.
इन धर्म ग्रंथो के रचयिता हैं कौन सारे पुरुष.
उन्हें धर्म के बताये अनुसार अच्छे कर्म करने पर स्वर्ग में अप्सरायें मिलेंगी.जन्नत की हूरों की व्यवस्था सिर्फ मर्दों के लिए औरतों को तो सिर्फ एक ही शौहर की माला जपना. क्यों कभी सोचा आपने.
भई वाह आप जैसी पढी लिखी दानिशमंद मजहब के तिलिस्म से बाहर नहीं आ पायीं.
रही तस्लीमाजी की बात सो वे आपके वश की बात नहीं आप फूलों की खूबसूरती पर मगन होंती रहें और वाहवाही लूटें.ख़तरा उठाने का जिगरा सब में नहीं होता.

इस पते पर मैने तस्लीमाजी के दर्द को महसूस कर ग़ज़ल कही है. जेहमत गवारा करें और उनके साथ मुझे भी कोसें जी भर के मैं इसे आपकी इनायत समझूँगा.
आमीन.डॉ.सुभाष भदौरिया
तस्लीमाजी पर लिखी मेरी ग़ज़ल का पता.
http://subhashbhadauria.blogspot.com/2008/02/blog-post_24.html

rakhshanda said...

बड़ी अजीब बात है,तसलीमा नसरीन से सहानुभूति करने वाले बुध्धि जीवी लोग हुसैन कि बात आते ही दूसरे एंगल से सोचने लगते हैं...किसी भी धर्म ने ओरत को उसका जायेज़ हक नही दिया,लेकिन इसका ये मतलब बिल्कुल भी नही है कि हम उस मज़हब के खिलाफ ऊल जलूल बातें लिखने लगें.ज़रा बताइए,कौन सा धर्म है जिसने इस्लाम से ज़्यादा ओरत को उसका हक दिया है.

munish said...

vahi to Rakhshoo ! i agree with u.