Saturday, April 19, 2008

खेल का ये कैसा तमाशा...



बड़े दिनों से जिस की चर्चा थी उसकी शुरुआत कल हो ही गई. आई. पी. एल यानी इंडियन प्रिमिअर लीग का उद्घाटन और ट्वंटी २० क्रिकेट के नए रूप की शुरुआत,जिसका एक रूप हम पहले ही आई.सी.एल के रूप में देख चुके हैं. यही वो बहुचर्चितरूप था जिसकी सारी दुनिया में चर्चा थी,चर्चा क्रिकेट को लेकर नही थी कि इस से क्रिकेट का किसी तरह का भला होने वाला था,भला तो बस क्रिकेटर सहित उन लोगों का होने वाला था जिन्होंने इस तमाशे पर बेतहाषा पैसा बरसाया था,देखना तो बस ये था कि,पैसा बरसाने वाले उसे वसूलते कैसे हैं, बहेर्हाल कल उसे भी दुनिया ने लिया,एक रंगारंग तमाशे से ज़्यादा इसे कुछ भी कहना किसी भी खेल की तोहीन होगी ।

बंगलोर का चिन्नास्वामी stadium दर्शकों से खचाखच भरा हुआ था,ये सभी लोग यहाँ क्रिकेट देखने नही आए थे ,क्रिकेट की आड़ में पैसों की रंगीनियाँ देखने आए थे,और हुआ भी यही,पूरे मैच में सिवाए newziland के ब्रेंडन मकुल्लम की लाजवाब आतिशी पारी के अलावा कुछ भी नही था,कोल्कता नाईट राइदर्स के २२२ रन के जवाब में बंगलोर रायल चैलेंजर्स की पूरी टीम मात्र ८० रनों पर सिमट गई,कोई संघर्ष तक देखने को नही मिला,विकेट गिरने पर कप्तान सोरव गांगुली का अपनी टीम के खिलाड़ियों से लिपट जाना कहीं से भी गर्मजोशी पैदा नही करता था.वो गर्जोशी और उमंग जो हमें टेस्ट क्रिकेट और एक दिवसिये क्रिकेट में दूसरे देशों के खिलाफ खेलते हुए महसूस होती है,कहीं से भी मन ये बात नही पा रही थी की हम किसी जीतते देखना चाहते हैं. मैं नही जानती कि दूसरे लोग इसके बरे में क्या सोचते हैं पर ये सिर्फ़ मेरा नजरिया है,थोडी देर देख कर ही मन उचाट हो गया.

बात जहाँ तक मकुल्लम की है,मैं उनकी पारी को लाजवाब मानती हूँ,वो सिर्फ़ एक लाख के इनाम के नही कई लाख के इनाम के हकदार थे,लेकिन फिर भी इतने चौके छक्के देख कर भी मन में कोई उत्साह नही जागा,ऐसा लगता है २०-२० क्रिकेट ने चौकों छक्कों का सारा जोश और सनसनी ही खत्म कर दी है,याद कीजिये, शाहिद आफरीदी ने अपना पहला आतिशी शतक जब मात्र ३५ गेंदों में ११ छक्कों के साथ बनाया था तो उसकी सनसनाहट कितने सालों तक हम भूल नही सके थे,श्रीलंका के सनथ जय सूरिया और सचिन तेंदुलकर कीआतिशी बल्लेबाजी कैसे दिल की धड़कनें बढ़ा दिया करती थी. क्या उसी जोश और उमंग की मात्र कल्पना भी हम यहाँ कर सकते हैं?

क्रिकेट का वो खूबसूरत रूप कभी ऐसा भी होगा,ये तो कभी कल्पना भी नही की थी मैंने.

इस सरे तमाशे में सब से ज़्यादा शर्मनाक रहा उसका उद्घाटन समारोह और उसके कार्यक्रम, ग्लैमर बढ़ाने के लिए विजय माल्या ने अमेरिका के पेशेवर चीयर लीडर तक को बुला लिया था,उसकी डांसर ने जो कपड़े पहेन रखे थे और जिस तरह से ख़ुद को दिखा रही थीं,उसे देख कर एक लड़की होने के नाते शर्म सी महसूस हो रही थी.कितनी अजीब बात है ,आधुनिक होते समाज में भी ओरत मात्र एक शो पीस बना कर रख दी गई है,आज से हजारों साल पहले राजा महाराजाओं के दरबार में उनकी और उनके दरबारियों की अय्याशी का साधन भी यही ओरत थी और आज इतने ज़माने गुज़र जाने के बाद भी वही आंखों कों ठंडक पहुँचने का जरिया है.

दौलत की इस जंग में भला ये सब सोचने की फुरसत किसे है वरना क्या यही हमारी सभ्यता है?

साउथ अफ्रीका में हुए २०-२० वर्ल्ड चम्पियाँशिप में इस तरह के कार्यक्रम हुए थे,लेकिन फिर भी इस के मुकाबले ज़्यादा शालीन थे. दूसरी बात वहां जो हुआ वो उनका culture था,लेकिन जो कल हम ने देखा,क्या ये भी हमारा culture था?

क्या लगाई हुयी लागत वसूलने के लिए हम इतना भी गिर सकते हैं?

27 comments:

भुवनेश शर्मा said...

सही कहा रक्षंदाजी यहां क्रिकेट के अलावा सब कुछ है

पेज3 फिल्‍म का एक गाना याद आ रहा है- ये जिंदगी इक अलग जिंदगी है, यहां ख्‍वाहिशें आसमां से बड़ी हैं....

mamta said...

सटीक लिखा है।
क्रिकेट नही बस सब पैसे की चमक-दमक है।

Pushpendra Srivastava said...

रक्षंदाजी hindia mai notes kese post hote hai, muche bataeye, mai es per apne notes hindi mai likunga,

Udan Tashtari said...

ये खेल नहीं व्यापार है..
सबको पैसे से प्यार है.

अतुल said...

अरे मैडम आपका फ़ांट नही दीख रहा है.

राज भाटिय़ा said...

क्रिकेट नही बस हमारी भावनो से खेला जा रहा हे,ओर यह सभी पेसा बना रहे हे.

Ashish Pandey said...

I am very sorry to say that its very outdated thiking... Come on, it seems that you are unaware about world of sports...

Look at European Soccer Leagues like EPL, Spanish league and all... They are also on same model. Soccer Players are offered a lot of money and in English clubs like Manchaster United, Arsenal, Chelsea and Spanish teams like Real Madrid, most of the players are foreigners, who are auctioned for much much more money...

Now lets look at American Basketball and Baseball, they too run on same model...

And moreover you are ignoring the fact that first time cricket will stop spreading hatred among India and Pakistan... first time people will watch it purely from sports and entertainment view, fake nationalism is killed...

You know, all the popular games are being run on this model and belive me it will not kill your culutre... culture is always changing thing... dont make it stink by stagnating...

YOU ARE WELCOME TO WRITE ON ANY TOPIC, BUT FIRST YOU MUST BE KNOWING ABOUT THE ISSUE...

KEEP YOURSELF UPDATED PLEASE

Ashish Pandey said...

I HOPE THIS WILL HELP YOU

1. France’s Zinedine Zidane was transferred from Juventus to Real Madrid on July 9th, 2001. The transfer fee is the highest ever quoted for a transfer of a soccer player at £47 million

2. Louis Figo in the year 2001, moved from Barcelona to Real Madrid for ₤38.7 million.

3. Andriy Shevchenko - Ukrainian strike and ex-AC Milan superstar moved to FC Chelsea for ₤30 million in 2006.

rakhshanda said...

@आशीष पांडे -sir,लगता है क्रिकेट का ये तमाशा आपको बहुत पसंद आरहा है,वैसे भी मैदान पर आई हजारों की भीड़ ख़ुद ही ये बता रही है कि लोगों को इस में मज़ा आरहा है,मैं नही जानती कि आगे इसका भविष्य क्या होगा पर फिलहाल तो अच्छा लग रहा है,मैंने लिखा भी है कि ये मेरी निजी राय है,जो मैंने महसूस किया वही लिखा...और जहाँ तक बात दुनिया के और खेलों में अधिक पैसों की है तो मुझे भी इतना तो पता है,लेकिन इमानदारी से बताइये क्या कहीं भी पैसों का इस कदर दिखावा किया जाता है?क्या और भी कहीं खिलाडियों की इस तरह बोली लगती है?
जिंदगी का एकमात्र सच क्या केवल पैसा होना चाहिए?
क्या इस से हमारे युवाओं पर अच्छा असर पड़ेगा?
हो सकता है आप मुझे पुराने ख्याल का समझें पर मुझे इस सारे तमाशे से नफरत है...
लेकिन आपका शुक्रिया कि आपने अपने ख़यालात का इजहार किया...थैंक्स.

DR.ANURAG ARYA said...

सीधी सी बात है सब पैसे का खेल है ,उद्योगपतियों के लिए एक व्यापार,कोम्मेंत्रटर के लिए लुभावनी नौकरी ,खिलाडियों के लिए ढेर सारा पैसा ,टी.वी के लिए एक ओर तमाशा ढेर सारे विज्ञापन .अंपायर के लिए एक ओर मौका ,ओर अखबार के लिए सुर्खिया....नई बोतल का नया नशा .....हम सब जानते है ये खेल नही है .. .

Ashish Pandey said...

जी रक्षंदा , आपकी जानकारी के लिए हर जगह बोली लगती है... मैंने अपनी दूसरी पोस्ट में जो आंकड़े दिए हैं वे बताते हैं कि किस तरह फुटबॉल, अमेरिकन सॉकर और बॉस्केटबॉल और बेसबॉल के खिलाड़ी क्रिकेट के मुकाबले कई गुना ज्यादा रकम लेकर क्लब बदलते हैं। डेविड बेकहम तो कुछ साल पहले कई सालों पुराना इंग्लिश क्लब मैनचेस्टर यूनाइटेड छोड़कर अमेरिकन क्लब गैलेक्सी के लिए खेलने चले गए थे, अरबों रुपये की फीस लेकर..
ऐसा नहीं है कि इन देशों में ऐसा होने के बाद खेल का नाश मर गया। खेल का नाश तब मरता है जब खिलाड़ी को उसमें मेडल के सिवा कुछ नहीं मिलता, मेडल जो बाद में दो वक्त की रोटी के लिए बिक भी नहीं पाता। खेल में पैसा आने दीजिए, तभी टैलेंटेड लोग इसमें आएंगे, वरना हमारे मां-बाप कहते रहे हैं खेलोगे कूदोगे तो बनोगे खराब...

जहां तक बात है कि क्या पैसा ही सब कुछ है, जी नहीं पैसा सब कुछ नहीं है, सब कुछ है दम,, खेल का दम... आने वाली लीग में देखिएगा जो खिलाड़ी जितना दमदार होगा, उसे उतने ज्यादा पैसे मिलेंगे... .यानी पैसा तभी मिलता है जब आपमें कुछ खास हो, और उसके लिए तो मेहनत ही करनी पड़ती है जो वाकई ईशांत शर्मा, सौरभ, साइमंड्स जैसे खिलाड़ियों ने की...
जिन्हें क्रिकेट पंसद नहीं, उनके लिए हॉकी औऱ फुटबॉल में भी लीग शुरू करने के कदम उठे हैं, लेकिन अफसोस कि इन खेलों को देखने के लिए लोग नहीं जुट रहे...

आपकी पहली लाइन थी कि मुझे लगता है बहुत मजा आ रहा है,,. देखिए मजा तो आपको और पब्लिक को आ रहा है तभी पैसा वसूल हो रहा है... एक्टर को पैसा मिले कुछ नहीं, पॉलिटिशियन नोट भऱ ले सब चुप, खिलाड़ी कमाने लगे तो सबको मिर्ची क्यों लग गई...

पहली बार जब क्रिकेट की जंग हो रही है तो हम लोग अपने देश की इज्जत को लेकर दुखी नहीं हैं और न ही किसी को पिच खोदने का बहाना मिल रहा है... वरना भारत-पाकिस्तान के मैच में इस मुल्क में दंगे हो जाते थे कभी..

Kavi Kulwant said...

आप के ब्लाग पर आप्की यह टाइटल पक्तियां अच्छी लगीं...
क्या कोई नई बात नज़र आती है हम में..
आईना हमें देख के हैरान सा क्यों है?
इसका उत्तर है हमारे पास..
क्यों कि आईना उल्टा दिखाता है..

संजय तिवारी said...

आशीष भाई यह लिंक भी देखिएगा फुर्सत मिले तो
http://visfot.com/index.php?news=38
रक्षंदा तुमने बिल्कुल सही नब्ज पकड़ी है. पैसे का खेल तमाशा हो गया है अब क्रिकेट इसलिए इससे दूर ही रहना चाहिए. क्या यह जरूरी है कि पश्चिमवाले जो कुछ करें भारत को वह सब करना चाहिए. जो ऐसी सलाह देते हैं ऐसे बौद्धिक महाबुद्धिमान लोगों से बचना चाहिए.

अभिषेक ओझा said...

मैं पहले तो ये बता दूँ की मैं क्रिकेट नहीं देखता... कभी कभार नतीजे देख लेता हूँ और किसने कैसा खेला... वो भी मैच के बाद.

मुझे IPL में कोई बुरे नहीं दिखती, अश्लीलता जैसी बात हो सकती है पर... उसके अलावा और कुछ भी ग़लत नहीं है...

अगर ये देखें की कितने लोगों को रोज़गार मिलेगा... कितने खिलाडी जो कुछ नहीं कर सकते थे उनको भी मौका मिलेगा... और अगर ये देखें की क्या हालत है हमारे देश में खेलों की, होकी की, ओलंपिक में हमारे प्रदर्शन की... तो खेलो को बढावा देने वाली कोई भी चीज़ बुरी कैसे हो सकती है?

पश्चिमी देशों की नक़ल करने की बात नहीं हो रही है.. लेकिन अगर पश्चिमी देस्सों में कुछ अच्छा हुआ है तो उसको नक़ल करने में क्या बुराई है? अगर पश्चिम का एक छोटा सा देश भी फूटबाल के वोल्ड कप में बहुत अच्छा खेल सकता है और इसका कारन IPL जैसी चीजें हैं तो उसको अपनाने में क्या बुराई है? अगर रोनाल्डो और जिदान बिक सकते हैं तो सचिन क्यों नहीं? अगर कोई पैसा बना रहा है तो इसमें बुराई क्या है?

एक बार संसद में अटल बिहारी वाजपाई ने नेहरू जी से सवाल किया था ... "जिस देश में लोगो के पास खाने को नहीं है वहाँ ५ स्टार होटल की क्या जरूरत है, सरकार को इसकी जगह पे अस्पताल बनवाना चाहिए"... नेहरू जी ने कहा था "हम अस्पताल भी बनवायेंगे लेकिन अगर हम अस्पताल और होटल दोनों बनाते हैं तो इसमें क्या बुराई है?"
बात वही है बाकी चीजों पे भी साथ-साथ ध्यान देने की जरुरत है ना की IPL जैसी चीजों को पीछे खीचने की..

Saurabh said...

Relax and enjoy things :)

Ashish Pandey said...

संजय और रक्षंदा
मेरी टिप्पणी कोई महाबौद्धिक नहीं है.. यह सीधी और सच्ची बात है जिसे समझने से आप जाने क्यों मुंह फेर रहे हैं...

पश्चिम की नकल करना बिल्कुल जरूरी नहीं है, लेकिन उस मॉडल पर काम करते रहना क्या जरूरी है जहां नैशनल हॉकी टीम में जगह पाने के लिए दो लाख रुपये की घूस देनी पड़ती है...

खेल को सरकारी मक्कड़जाल और भूख से मरने से बचाना है तो उसे पॉपुलर बनाना होगा और खिलाडियों के लिए इसमें पैसा लाना ही होगा... सरकार के बस की यह बात नहीं बाजार ही करेगा ...

ऐसा नहीं होता तो क्रिकेट भी एक दिन हॉकी की मौत मर जाता...

Ashish Pandey said...

बौद्धिक महाबुद्धिमान

पता नहीं ऐसे शब्दों में हताशा क्यों नजर आती है...

rakhshanda said...

आशीष जी ,ठीक है कुछ हद तक मैं आपकी बातों से सहमत हो जाती हूँ,,खेलों के बढावे के लिए पैसा आना चाहिए...पर आप ही बताइए,हर समय पैसा ,पैसा करते रहने से क्या खेल को बढावा मिलेगा?
आप ही बताइए ,२०-२० के इस तमाशे में ,सॉरी खेल में यदि कई खिलाडी घायल हो जाते हैं और किसी इंटरनेशनल परतियोगिता में खेलने से वन्चत रह जाते हैं तो क्या ये खेल के लिए अच्छा होगा?
ठीक है खिलाड़ियों को तो कोई फर्क नही पड़ेगा क्योंकि उन्हें तो ढेर सारे पैसे मिल ही चुके हैं,रही बात देश के लिए खेलने के जज्बे की,तो वो तो अब पुँरानी बात हो गई है,अब देश के लिए खेलने से अच्छा क्रिकेट के लिए खेलना है..ठीक है ना?
जहाँ तक बात हाकी के पतन की है तो उसकी वजह पैसों की कमी के साथ लोगों का इस खेल को पसंद न करना रहा है,साथ ही साथ ,खिलाड़ियों का गिरता पर्दर्शन भी...सब से बड़ी चीज़ है जज्बा ,मर मिटने का जज्बा,ये टैब भी था जब पैसा नही था और हमेशा होना चाहिए....पैसा तो बाद की चीज़ है.

Ashish Pandey said...

रक्षंदा, लगता है बहस सही रास्ते पर है और आपकी आशंकाओं का जवाब आपको मिल रहा है..

कुछ सवाल अब भी बाकी हैं...

1. २०-२० के इस तमाशे में ,सॉरी खेल में यदि कई खिलाडी घायल हो जाते हैं तो...

- देखिए, आप इतना पूर्वाग्रह से ग्रसित हैं कि पहले ही इसे खेल मानने से इनकार कर रही हैं और बार-बार तमाशे का नाम दे रही हैं जबकि यह खेल का ही नया रूप है... यकीन करिए लीग के पहले सात मैचों में ही गजब का खेल देखने को मिला है और कुछ गिने-चुने नामों से आगे का टैलंट लोगों के सामने आ रहा है...इंटरनैशनल मुकाबलों से वंचित की चिंता भी मत करिए क्योंकि यह वाकई इंटरनैशनल मुकाबला है, फर्क बस इतना है कि यहां पॉन्टिंग को सायमंड्स की बॉलिंग का सामना करना है और सचिन होंगे ईशांत के सामने.. वाकई अद्भुत रूप है यह क्रिकेट का जहां आपके दमखम की असली परीक्षा हो रही है... सारी बाधाएं टूट चुकी हैं और एकदम नया रूप है.. इंग्लैंड ने अपने खिलाड़ियों को इस लीग में खेलने की इजाजत नहीं दी है, इस पर दुनिया के महानतम बल्लेबाज केविन पीटरसन और उनके कैप्टन वॉन इंग्लिश क्रिकेट लीग से बगावत के तेवर दिखा रहे हैं, ऑस्ट्रेलियाई क्रिकेट खिलाड़ियों के बीच हुए सर्वे में पता चला कि अधिकतर लोग अपने मुल्क के बजाय इस लीग में खेलना चाहते हैं..
देखिए क्रिकेट का सबसे ज्यादा सम्मान भारत में होता है और हर कोई मुल्क के दायरे से बाहर आकर क्रिकेट के इस असली महाकुंभ में शामिल होना चाहता है... इसलिए यह बात करना कि कोई खिलाड़ी घायल हो गया और इंटरनैशनल मुकाबलों से वंचित हो गया तो क्या होगा, एकदम बेकार की बात है, खिलाड़ी खुद इसी में खेलना चाहते हैं...और यही इंटरनैशनल मुकाबला नंबर-1 है... फुटबॉल आप अगर देखती हैं तो हर साल होने वाली चैंपियंस लीग और यूएफा कप की दीवानगी यूरोप में वर्ल्ड कप से कम नहीं है... इस वीकेंड मैनचेस्टर यूनाइटेड (इंग्लिंश लीग का क्लब) और बार्सिलोना (स्पैनिश लीग का क्लब) के बीच पहला सेमिफाइनल है, दोनों टीमों में इंग्लैंड, स्पेन और ब्राजील समेत कई मुल्कों के खिलाड़ी हैं और आपको इसमें विशुद्द फुटबॉल देखने को मिलेगी, इसे तमाशा कहने की बेवकूफी कोई भी फुटबॉल प्रेमी नहीं करता है... अब इसे पश्चिम की नकल मत कहिए क्योंकि यह स्पोर्ट्स का ट्रेंड है न कि पूरब या पश्चिम का ...

2.
जहाँ तक बात हाकी के पतन की है तो उसकी वजह पैसों की कमी के साथ लोगों का इस खेल को पसंद न करना रहा है,साथ ही साथ ,खिलाड़ियों का गिरता पर्दर्शन भी...

ऐसा नहीं है कि लोग इस खेल को पसंद नहीं करते, दरअसल टीम का हारते जाना और उसी वक्त क्रिकेट में भारत का विश्व चैंपियन बनना एक नया बदलाव लाया.. अब दिक्कत यह है कि हॉकी में दो फूटी कौड़ी नहीं मिलती, बस सरकारी या पीएसयू नौकरी का लालच बचा है... ऐसे में जिन बच्चों में खेल के प्रति लगाव है या खेल के फील्ड में करियर बनाना चाहते हैं, उनके लिए पहली पसंद हॉकी नहीं बल्कि क्रिकेट है,,, क्योंकि हॉकी में फ्यूचर ब्लैंक है और टीम में आने के लिए भी घूस देनी पड़ती है.. जबकि क्रिकेट में इस वक्त ही भारत में दो इंटरनैशनल लीग (जिन्हें आप तमाशा कहती हैं 0 आईपीएल और आईसीएल) चल रही हैं.. रणजी तक भी पहुंचे तो बहुत कमाई है...नैशनल लेवल में तो आप हीरो बन जाते हैं... हॉकी में क्या होगा. आपको 3 नैशनल खिलाड़ियों के नाम भी नहीं मालूम होंगे...

3.सब से बड़ी चीज़ है जज्बा ,मर मिटने का जज्बा,ये टैब भी था जब पैसा नही था और हमेशा होना चाहिए....पैसा तो बाद की चीज़ है.

बिल्कुल सही कहा आपने... देश के लिए मर-मिटने का जज्बा भारतीय खिलाड़ियों में नहीं है. ऐसा आपसे किसने कहा, ऑस्ट्रेलिया टूर देखा था ना आपने या फिर पिछले साल टी-20 का वल्डर् कप... ये खिलाड़ी दम लगाकर खेलते हैं इसिलिए तो इनके पास पैसा आ रहा है, इसमें इतनी मिर्च लगने की क्या बात है... और फिर मर-मिटने की सारी कसर इन्हीं से पूरी क्यों कर लेना चाहती हैं आप... साइंस, टेक्नॉलजी, फैशन, एथलेटिक्स, हॉकी, फुटबॉल, पॉलिटिक्स, आर्ट्स तमाम फील्ड हैं .. इनमें से कई ऐसे हैं जिनमें सब कुछ पैसा नहीं है और न ही हम कमाल दिखा पाए हैं... यानी पैसा होने या न होने से जज्बे पर क्या असर पड़ता है...

फिर से समझिए... ऐसे तमाम फील्ड हैं जिनमें पैसा नहीं है, लेकिन उनमें हमारा मुल्क कुछ नहीं कर पा रहा.. और ऐसे भी कई फील्ड हैं जिनमें काफी पैसा है लेकिन भारत अच्छा कर रहा है... ऐसे में यह मत सोचिए कि पैसा होने की वजह से या न होने की वजह से ही अच्छा हो रहा है, इकने पीछे तमाम फैक्टर हैं....

बहुत लंबा भाषण हो गया, मेरी कई बातें या तो आपको पसंद नही आई होंगी या उनमें कुछ कमजोर तर्क रह गया होगा.... लेकिन मेरा मकसद आपको नीचा दिखाना नहीं है बल्कि मैं कुछ तर्क दे रहा हूं... बस इतना अनुरोध है कि किसी भी पॉपुलर चीज को बस तमाशा कहकर खारिज मत करिए...

rakhshanda said...

एक बात तो माननी पड़ेगी कि खेलों के प्रति आपकी जानकारी गज़ब की है,आपने जो तर्क दिए हैं वो भी अपने आप में लाजवाब कर देने वाले हैं,really,आशीष मैं तो आपकी फैन हो गई हूँ, लेकिन फिर भी आपकी कुछ बातों से अब भी सहमत नही हूँ...

फॉर example-----इंटरनैशनल मुकाबलों से वंचित की चिंता भी मत करिए क्योंकि यह वाकई इंटरनैशनल मुकाबला है, फर्क बस इतना है कि यहां पॉन्टिंग को सायमंड्स की बॉलिंग का सामना करना है और सचिन होंगे ईशांत के सामने.. वाकई अद्भुत रूप है यह क्रिकेट का जहां आपके दमखम की असली परीक्षा हो रही है... सारी बाधाएं टूट चुकी हैं और एकदम नया रूप है.

आशीष जी,, आपके कहने का क्या मतलब है की हम इसी तथा कथित क्रिकेट के अद्भुत रूप को ही अपना लें,बाकी की चिंता छोड़ दें ?
क्यों? सिर्फ़ इसलिए की खिलाडी इस से खुश हैं और उनका बैंक बैलेंस बढ़ रहा है?
मतलब ये कि यदि खिलाड़ी घायल होते हैं तो होते रहें...अन्तर राष्ट्रिय मुकाबलों में उपलब्ध हों न हों ,ये बात कोई मायने नही रखती,जब अन्तर राष्ट्रीय मुकाबले ही आपकी नज़र में कोई अहमियत नही रखते तो फिर कैसी बहेस.

आपने कहा कि पहले ही सातों matches में इतना मज़ा आरहा है ' मज़ा....कहाँ है मज़ा?
मुझे तो इसकी एक गेंद में मज़ा नही आरहा,मैं ख़ुद हैरान हूँ आशीष जी,कि क्रिकेट की दीवानी वो लड़की आज इतने चर्चित (आपके लफ्जों में,,खेल का अद्भुत रूप)महा कुम्भ का एक ओवर देखना क्यों नही चाहती?
आप जानते हैं? सौरव गांगुली ,ग्रीम स्मिथ ,शॉन पोलक ,डेल स्टेन शहीद आफरीदी मेरे पसंदीदा खिलाड़ी हैं,लेकिन आज उनका खेल देखने की भी इच्छा नही होती,पता नही क्यों?
आप ही बताइए क्या इतने चौके छक्के दिल में ज़रा सा भी वो जोश जगा पारहे हैं जो अभी तक हम अपने अन्दर जागता महसूस करते थे?
नही....मैं तो महसूस नही करती...बिल्कुल मशीनी अंदाज़ का खेल हो गया है,न कोई सनसनी न कोई जज्बा,ऐसे खेल का क्या फायेदा?
और जहाँ तक आपकी दूसरी बात कि 'यही इंटरनैशनल मुकाबला नंबर-1 है. तो फिर तो आपके ख्याल में बाकी मुकाबलों को धीरे धीरे बंद हो जाना चाहिए,ओह्ह्ह god कैसे कह सकते हैं आप ऐसा?
बरसों से क्रिकेट का जो सुंदर रूप चला आरहा है उसे ललित मोदी जैसे कुछ सरफिरे लोगों के कारण बंद हो जाना चाहिए?या फिर उसे पीछे धकेल देना चाहिए?
आप जानते हैं इसका नतीजा क्या होगा?
आपने ये कैसे सोच लिया कि इतनी आसानी से भारत एक महा कुम्भ कि शुरुआत करेगा और सारी दुनिया सर झुकाए उस में शामिल हो जायेगी...नही,आने वाले कल में ऐसे और भी महा कुम्भ शुरू होंगे ,दूसरे देशों में भी...उदाहरण के लिए अभी हाल ही में इंग्लैंड और वेल्स क्रिकेट बोर्ड को पाँच 20-20 मैचों के लिए किसी व्यापारी स्टैनफोर्ड ने १०० करोड़ डॉलर का आफर दिया है,आगे भी इसी तरह की बातें होंगी,मकसद होगा सिर्फ़ एक...ज़्यादा से ज़्यादा पैसा .लगना और उसे वसूलना...कैसा खेल और कैसा जज्बा,नही आशीष जी मुझे नही लगता कि ये खेल और क्रिकेट के लिए अच्छा होगा...
बाकी मैं क्या कहूँ,मेरे कुढ़ने से ये सब कुछ बंद तो होगा नही ,लेकिन दुआ यही है कि लोग इस बात को समझें कि इस से खेल का भला नही होगा,बल्कि आने वाले दिनों में क्रिकेट सिर्फ कुछ पैसे वालों के हाथ का खिलौना बन जाएगा और खिलाडी उनके हाथों की कठपुतली .

Ashish Pandey said...

Oh Rakshanda... How little you understood me...

I never said that international matches and national pride is gone... It will be alive... See even after so many soccer leagues in europe Players and ppl watch Euro and World cup with so much thrill.. Belive me, future is here and both - league and International matches will coexist together...

Plus why are you so much worried about players, belive me they will work harder for fitness... it happens in every game and Soccer, baseball and Basketball require more fitness than cricket. So if it can happen there, why not here..

Do you know in last Soccer world cup it was a crucial match between England and Brazil... English striker Rooney got red card after altercation with Brazilain Ronaldo.. and it was a big tension issue... But after the world cup both were playing for Manchaster United together.. It was so much fun to watch them fighting for national pride in world cup and playing together for their club with vigour in English premire league... It will happen here too and belive me it will be greater fun for us...


Yaar Maza to khoob aa raha hai, I dont know what has happned to you with your intellect... Kal raat Bhajji ko CSK ke khilaf jeet ke liye chatpate dekhna lajwab tha...

As far as Stanford is concerned, he is already organising a league in west indies but that is not successful as cricket is most loved in this part of the world.. Plus dont worry if so many leagues start, it will happen in coming days and you will watch inter league tournaments also....

Watch it with pure sports angle... you will have fun... In case you still dont like it, remote control always give you option to turn for Kyonki Saas bhi kabhi...


Thanks for the compliments and Even I enjoyed this debate

Njoy

Ashish Pandey said...

Bas last comment

When one day cricket was launched first time, it was a shock to many puritans... They refused to accept it as a normal form of the game and said its a PAYJAMA CRICKET, much like you call 20-20 a tamasha...They said one day is boring, it will kill the game, its not the real sport and all ...

But look, after so many years, it was the most popular form of the cricket...

It will happen with the IPL also, some ppl will cry but the game will win... It happens with every new thing...

;-)

rakhshanda said...

क्या कहा आपने?
मज़ा ना आए तो 'क्योंकि सास भी...'' देख लूँ?
उसे देखने से अच्छा टीवी की स्क्रीन तोड़ देना है...वैसे खुशी हुयी की कुछ लोगों को इस में मज़ा आरहा है,बाकी बात तो आपने साफ लफ्जों में कह ही दी,हम जैसे लोगों को मज़ा नही आरहा है तो ये हमारी प्रोब्लम है,ठीक ही है,बात खत्म हो गई,हिमेश रेशम्या अगर हजारों लोगों को पसंद हैं,उनके गाने हिट हो रहे हैं तो हम जैसे दो चार बेवकूफ उन्हें बेसुरा भी कहें तो क्या बिगाड़ सकते हैं...ज़्यादा से ज़्यादा यही कर सकते हैं कि दुनिया को पागल होता देखते रहें और ख़ुद अलग हट कर बंद कमरे में मेहदी हसन कि गज़लें सुनकर सब कुछ भूलने की कोशिश करें...

आशीष जी,आज से मैं भी बोलती हूँ...आई.पी.एल की जय

Ashish Pandey said...
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Ashish Pandey said...

Rakshanda...
Please dont be so sarcastic about ppl who prefer Himesh over Mehdi , and who love CNN over Star plus... Its about choices and preferences, everyone may have a different taste... Ppl who watch Saas Bhi Kabhi bahu are not stupids, its just their choice of entertainment is different..

You know last night I was going home after releasing the paper at 11-30, there was a huge crowd at a Dhaba and all were watching TV, all of them were local jhuggi walas.suddenly they erupted in noise, cheering Rajasthan Jeet gaya...I was amazed, never expected IPL to be so popular...
But then you may not consider them at par with you at intellectual level so their choice of sport will obvioulsy be degraded...

Dont say IPL ki Jai... just watch it with pure sports+entertainment level... I am sure you will love the kind of matches are happening ( I hope you saw the one between Royals and Deccan Chargers)...
If you are still not watching, try 2-3 games,,, you will fall in love with this... Shane Warne bowling to Symonds was great ...

And if you still hate it, do watch Manchaster United vs Chelsea on Saturday... it will decide who wins English Premire Legaue this year...

have fun, Enjoy the game

rakhshanda said...

इस में कोई शक नही आशीष जी की आई.पी.एल बहुत पापुलर हो रहा है,हैरानी होती है लोगों की भीड़ देख कर,यहाँ ये हाल कि टीवी पर दो से चार ओवर बर्दाश्त नही हो रहा ,कहाँ मैदान पर लोगों की ये दीवानगी,चलिए जो हो रहा है,जैसा हो रहा है accept तो करना ही पड़ेगा,हो सकता है कभी मुझे भी ये बर्दाश्त हो सके,फिलहाल तो आपकी बात पर अमल कर के Manchaster United और Chelsea का मैच ही देखने की कोशिश करुँगी,क्योंकि इन सब से अच्छा तो वही होगा,बावजूद इस के कि फ़ुट बाल में मेरी दिलचस्पी क्रिकेट और टेनिस के मुकाबले कम है.

Ashish Pandey said...
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