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Thursday, July 17, 2008

जेहनी गुलामी का करार तो हम पहले ही कर चुके हैं....

(मेरी इस पोस्ट में मेरी कुछ बातें होसकता है कि कुछ लोगों को नागवार गुजरें, लेकिन मुझे इस की परवाह नही है.)


अमेरिका के साथ एटमी करार को लेकर सयासी घमासान अपने शबाब पर है,इसी बहाने अपनी अपनी सियासी रोटियां फिर से ताज़ा करने का मौका सब को मिल गया है.दो चार दिन में ही सारी तस्वीरें साफ़ हो जायेंगी लेकिन इन तस्वीरों पर बिखरी धुंध में एक चीज़ जो साफ़ दिखाई दे रही है वो ये कि करार करना या न करना तो एक formality है जो हो, न हो, कोई खास फर्क नहीं पड़ने वाला है, क्योंकि अमेरिका परस्ती तो अब हमारी रगों मे खून बनकर समां गयी है.
नहीं, मैंने न कोई सर्वे रिपोर्ट पढ़ी है न ही कोई ऐसी ख़बर, लेकिन इतना मैं यकीन से कह सकती हूँ कि अगर कोई सर्वे कराया जाता है और हमारी नौजवान नस्ल से एटमी करार पर राय ली जाती है तो कम-अज-कम 80% परसेंट लोग इस डील के हक में होंगे क्योंकि आज की नौजवान नस्ल को ये भरम हो चला है कि जहाँ साथ अमेरिका का होगा, वहां हमारे हाथ में सिर्फ़ खुशहाली ही होगी. ग्लोबलाइजेशन और बाजारवाद की कोख से निकला हमारा नौजाद मत्वसित तबका(मध्यवर्गीय) पूरी तरह बदल चुका ही. पुरासाइश जिंदगी, शानदार पैकेज ऑफर करती जॉब और मेट्रो कल्चर ही आज की नौजवान नस्ल की जिंदगी का मकसद बन गया है.जिन्हें ये सब कुछ मिल गया ही, वो तो बस इसी के हो कर रह ही गए हैं, जिन्हें नहीं मिल सका है, वो इसे पाने के लिए frustration का शिकार हो रहे हें. इसे पाने के लिए वो कोई भी कीमत देने को तैयार हैं. चाहे वो कीमत उन्हें अपनी values अपने कल्चर या अपने रिश्तों की कुर्बानी की सूरत में क्यों न चुकानी पड़े.
ये मीठा और धीमा ज़हर धीरे धीरे हमारी रगों में उतरा.
इसकी शुरुआत हमारे बच्चों से हुयी. हमें ख़ुद ही नहीं पता चला कि कब ख़ुद हम ने ही अपने बच्चों को मग्रिबी (वेस्टर्न) कल्चर के रास्ते पर धकेल दिया.
अपने कल्चर को सारी दुनिया में वस्अत (फैलाना) बख्शना मग्रिबी मुमालिक का सब से बड़ा ख्वाब था. उन्हें ये भी पता था कि वक्त बदल गया है, किसी दूसरे मुल्क पर ताकत के ज़ोर पर कब्जा करना न तो आसान रह गया है न ही फायदे का सौदा.

इस से ज़्यादा फायदेमंद और कारामद सौदा है लोगों के ज़हनों पर कब्जा करना. ज़हनों पर कब्जा आसान नहीं होता और ये वक्त भी काफ़ी लेता है, लेकिन जब हो जाता है तो फिर दुनिया का कोई भी गांधी या मंडेला उसे आजाद नहीं करा सकता.

सब कुछ प्री प्लानिंग हुआ.
कहते हैं किसी के सामने आप अपनी बात मजबूती से तभी रख पायेंगे जब सामने वाला आपकी ज़बान या भाषा समझता हो.
अंग्रेज़ी को इंटरनेशनल ज़बान बना कर उन्होंने सब से पहले यही किया.

उसके बाद सब आसान होता चला गया.
हर तरफ़ अंग्रेज़ी का क्रेज़, ‘’अंग्रेज़ी जाने बिना काम नहीं चल सकता’’ जिसे अंग्रेज़ी नहीं आती वो तरक्की नहीं कर सकता’’ ये थी हमारी सोच जो ठीक उनके मिशन का आईना थी.
हम अन्ग्रेज़िअत के जेहनी गुलाम, अधाधुंध इंग्लिश मीडियम स्कूल बनाते गए और हमारे बच्चे वहां पढने पर मजबूर कर दिए गए.
उनकी प्लानिंग अपनी रफ्तार से आहिस्ता आहिस्ता चलती रही. जाने किते मिशनरी स्कूल खुलते रहे.
अंग्रेजियत का ज़हर धीरे धीरे हमारी रगों में उतरता चला गया.
हमारे बच्चे अंग्रेज़ी ज़बान की इस सीढ़ी से मग्रीबी दुनिया की झलक देखने लगे.
ये दुनिया रंगीन थी, आजाद थी, यहाँ खुशहाली थी, रौशनी की चकाचौंध थी. यहाँ न कोई पाबन्दी थीं न किसी तरह की कोई रोक-टोक.
यहाँ न मज़हब के लिए अपनी ख्वाहिशों को कंट्रोल करना पड़ता था न ही कोई रिश्ते इन ख्वाहिशों के हुसूल के रास्ते की रुकावट बनते थे.
न values की दुहाई, न कल्चर का झंझट.
हमारे बड़े होते बच्चे इस सेहरअंगेज़ (जादुई) दुनिया को हसरत से देखने लगे.
और फिर, एक दिन उनकी ये हसरत हकीकत का रूप धारे उनके सामने आ खड़ी हुयी कि हाथ बढाओं और उसे हासिल कर लो.
ग्लोबलाइजेशन का दौर आया. सब कुछ सब को हासिल हो गया. शहरों से लेकर गावों तक इसकी लहर चल निकली. मल्टी नेशनल कंपनियों ने अधूरे ख़्वाबों को पंख लगा दिए, हम उड़ने लगे. बिना नीचे देखे हुए.
हमारा कल्चर, मेट्रो कल्चर, हमारी पसंदीदा खुराक पिज्जा और बर्गर, पसंदीदा ड्रिंक, पेप्सी और कोक , हमारे बच्चे कार्टून चैनल्स तो teen-agers एनिमेक्स के दीवाने, हमारे लिबास जींस और टी-शर्ट, अब हम बीफोर मैरेज सेक्स को बुरा नहीं मानते. अपने जज्बों के इज़हार के लिए हम किसी न किसी ‘डे’ के मुहताज हो गए हैं. दबी ज़बान में ही सही, अब हम लिव-इन रिलेशनशिप की बातें भी करने लगे हैं. हम किसी गालिब और इकबाल को नहीं जानते हैं न ही टैगोर और प्रेमचंद को, कबीर और रहीम के दोहों पर तो हमें हँसी आती है. हम और हमारे बच्चे तो जे.के रोलिंग और जे.आर.आर.टाकिन को फख्र के साथ पढ़ते हैं.

अपनी दोनों माद्री(राष्ट्रिय) ज़बान को अपना कहते हुए हमें शर्म और झिझक महसूस होती है. हाँ, अंग्रेज़ी हम बड़े फख्र से बोलते हैं और जिन्हें नहीं आती, वो बदनसीब बड़ी हसरत से हमें देखते हैं . अमेरिका में रहना, हमारी नौजवान नस्ल का सब से बड़ा ख्वाब ही तो बेटा अमेरिका में नौकरी करे और बेटी का रिश्ता किसी ग्रीन कार्ड होल्डर दे हो जाए, ये ख्वाहिश हमारे वालदैन की भी होती है
कभी कभी हैरानी होती है कि ऐसा कैसे हो गया? क्या सदियों पुराने हमारे मजहबों, हमारी रस्मों और रवायतों के रंग इतने कच्चे थे कि हम ने उसे इतनी आसानी से उतार फेंका?
हमारे मुस्लिम नौजवान भी किसी से पीछे नहीं हैं, वो भी अमेरिकी रंग में रंग चुके हैं.
उन्हें न अपने मज़हब से कोई खास दिलचस्पी है न अपने कल्चर से.

उन्हें इस बात से कोई मतलब नहीं है कि अमेरिका हमारी कौम के साथ क्या कर रहा है. न वो फिलिस्तीन के मजलूमों को जानते हैं न इराक और अफगानिस्तान के बेक़सूर मासूमों को. उनकी नज़र में ओसामा-बिन-लादेन तो दहशत गर्द है लेकिन अमेरिका और जॉर्ज बुश नहीं.
महमूद अहमदीनेजाद जैसे लोग तो हमारे मुस्लिम नौजवानों कि निगाह में बेवकूफ और जिद्दी हैं .
वो दलील देते हैं कि उनकी जिद से इरान को क्या मिलेगा. उसका हश्र भी बाकी लोगों की तरह होगा. हाँ, अमेरिका से दोस्ती करने में हमारा फायदा ही फायदा है.

कैसी ज़हनियत हो गयी है हमारी….अरे , हम तो उन गीदड़ और जंगली कुत्तों से भी गए गुज़रे हैं जो शेर के शिकार किए हुए माल को मुफ्त में पाने के लिए उसकी दुत्कार भी सुनने को तैयार रहते हैं.

हमारे जेहन गुलाम हो गए हैं.और जब जेहन गुलाम हो जाएँ तो आज़ादी मुमकिन नहीं होती.
अब करार हो न हो, इस से कोई फर्क नहीं पड़ने वाला, क्योंकि जेहनी गुलामी की डील तो हम पहले ही कर चुके हैं.